भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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३५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- न्यायकन्दली नन्वेवं बालशरीरावयवा अविनष्ट एव तस्मिन्नाहारावयवसहिताः शरीरान्तरमार- भेरन् ? आरभन्ताम् ? यदि पट इव खण्डावयविनां वृद्धशरीरे तिष्ठति विनाशिते वा पूर्वशरीराणामुपलम्भः सम्भवति ? अथ नास्ति, न तत्रायं विधिः, यथादर्शनं व्यवस्था- पनात् । एतेनारम्भारम्भकवादपक्षे परमाण्ववस्थितस्य जगतो ग्रहणं न स्यादित्यपि प्रत्युक्तम्, परमाणूनां त्र्यणुकादिकारणत्वाभावस्य पृथिव्यधिकारे दर्शितत्वात् । अथवा यदि परमाणवो द्व्यणुकमारभ्य तत्सहितास्त्र्यणुकमारभन्ते, त्र्यणुकसहितास्तु द्रव्यान्तरम्, तथापि कुतो विश्वस्याग्रहणम् ? महत्त्वानकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाणामुपलब्धिकारणानां सम्भवात् । अथ सत्यपि तेष्वतीन्द्रियाश्रयत्वादतीन्द्रियत्वमेव, एवं द्व्यणुकारब्धस्य त्र्यणुकस्यातीन्द्रियत्वे तत्पूर्वकस्य विश्वस्यातीन्द्रियत्वं त्वत्पक्षेऽपि दुर्निवारम् । तस्मान्नेयमत्रानुपपत्तिः । परमा- णूनां त्र्यणुकारम्भकत्वे पृथिव्यधिकारोक्तैव युक्तिरनुगन्तव्या । कपड़े के टुकड़ों की उपलब्धि होती है । अगर उस महापट के बिलकुल नष्ट होने पर ही उन (उपलब्ध छोटे-बड़े) पटों की उत्पत्ति हो, तो फिर कथित उपलब्धि की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । (प्र.) तो फिर बालक के शरीर के अवयव भी उसी शरीर में बिना उसके विनष्ट हुए ही भोजन-द्रव्यों के अवयवों की सहायता से दूसरे शरीर को उत्पन्न कर सकते हैं ? (उ.) कर ही सकते हैं, अगर वृद्ध शरीर के नष्ट होने पर या रहते हुए ही पट की तरह उसके खण्ड अवयवियों की भी उपलब्धि सम्भव हो । अगर यहाँ खण्ड अवयवियों की उपलब्धि नहीं होती है तो फिर दूसरे शरीर की उत्पत्ति का वह प्रकार भी यहाँ नहीं है । जहाँ जैसी स्थिति रहती है, वहाँ वैसी व्यवस्था की जाती है । उक्त निरूपण से किसी सम्प्रदाय की यह आपत्ति भी मिट जाती है कि 'आरभ्य-आरम्भकवाद' पक्ष में परमाणुओं में विद्यमान संसार की उपलब्धि नहीं होगी; क्योंकि परमाणुओं में त्र्यणुकादि द्रव्यों की कारणता किस प्रकार से है ? सो पृथिवी निरूपण में दिखला चुके हैं । अथवा यह मान भी लें कि यदि परमाणु ही द्व्यणुकों को उत्पन्न कर उन्हीं द्व्यणुकों से मिलकर त्र्यसरेणु को भी उत्पन्न करते हैं एवं त्र्यसरेणु से मिलकर और द्रव्यों को भी, तब भी विश्व का अप्रत्यक्ष क्यों होगा ? चूँकि प्रत्यक्ष के जितने भी महत्त्व अनेकद्रव्यवत्त्वादि विशेष कारण हैं, सभी विद्यमान हैं । अगर विशेष कारणों के रहते हुए भी केवल अतीन्द्रियों (परमाणुओं) में आश्रित होने के कारण ही द्व्यणुक अतीन्द्रिय हो तो फिर अतीन्द्रिय द्व्यणुकों से आरब्ध होने के कारण त्र्यसरेणु भी अतीन्द्रिय होंगे और त्र्यसरेणु से आरब्ध सम्पूर्ण विश्व में ही अतीन्द्रिय में आश्रित होने के कारण अतीन्द्रियत्व की आपत्ति तुम्हारे पक्ष में भी समानरूप से होगी । अतः यह दोष यहाँ नहीं है । परमाणु साक्षात् ही त्र्यसरेणुओं का उत्पादन नहीं करते, इस प्रसङ्ग में पृथिवी निरूपण में कही गयी युक्तियों का ही अनुसन्धान करना चाहिए । (देखिये पृ० ८०, पं० ३)

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