भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५५ प्रशस्तपादभाष्यम् यदा पार्थिवाप्ययोरण्वोः संयोगे सत्यन्येन पार्थिवेन पार्थिवस्य, अन्येन चाप्येन चाप्यस्य युगपत्संयोगौ भवतस्तदा ताभ्यां संयोगाभ्यां पार्थिवाप्ये द्व्यणुके युगपदारभ्येते । ततो यस्मिन् काले द्व्यणुकयोः कारणगुणपूर्वक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले इतरेतरकारणा- से दोनों संयोगों की उत्पत्ति कैसे होती है ? (उ.) जब पृथिवी का एक परमाणु जल के एक परमाणु के साथ संयुक्त होता है, फिर वही पार्थिव परमाणु दूसरे पार्थिव परमाणु के साथ एवं वही जलीय परमाणु दूसरे जलीय परमाणु के साथ एक ही समय संयुक्त होता है, (इसके बाद दोनों पार्थिव परमाणुओं के एवं दोनों जलीय परमाणुओं के) दोनों संयोगों से एक ही समय पार्थिव द्व्यणुक और जलीय द्व्यणुक दोनों की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय कारणगुणक्रम से दोनों द्व्यणुकों में न्यायकन्दली एकस्माच्च संयोगाद् द्वयोरुत्पत्तिः कथमित्यज्ञेन पृष्टः सन्नाह-यदेति । पार्थिवाप्ययोः परमाण्वोः संयोगे सत्यन्येन पार्थिवेन परमाणुना पार्थिवस्य परमाणोरन्येनाप्येन चाप्यस्य परमाणोर्युगपत्संयोगौ भवतस्तदा ताभ्यां संयोगाभ्यां पार्थिवाप्ये द्व्यणुके युगपदारभ्येते । समानजातीयसंयोगस्य द्रव्यान्तरोत्पत्तिहेतुत्वात् । ततो यस्मिन्नेव काले पार्थिवाप्यद्व्यणुकयोः कारणगुणपूर्वक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः, तस्मिन्नेव काले इतरेतरकारणाकारणगतात् संयोगा- किसी अज्ञपुरुष के द्वारा 'एक ही संयोग से दो संयोगों की उत्पत्ति कैसे होती है ?' यह पूछे जाने पर 'यदा' इत्यादि से इसका उत्तर कहते हैं । (जहाँ) एक पार्थिव परमाणु और एक जलीय परमाणु दोनों परस्पर संयुक्त रहते हैं (वहाँ) उक्त पार्थिव परमाणु का दूसरे पार्थिव परमाणु के साथ एवं उक्त जलीय परमाणु का दूसरे जलीय परमाणु के साथ, एक ही समय दो संयोगों की उत्पत्ति होती है । वहाँ इन दोनों संयोगों में से दोनों पार्थिव परमाणुओं के संयोग से पार्थिव द्व्यणुक की एवं दोनों जलीय परमाणुओं के संयोग से जलीय द्व्यणुक की उत्पत्ति अवश्य ही होगी; क्योंकि एक जाति के दो द्रव्यों का संयोग (उसकी जाति के) दूसरे द्रव्य की उत्पत्ति का कारण है । इसके बाद जिस समय कथित पार्थिव और जलीय दोनों द्व्यणुकों में 'कारणगुणपूर्वक्रम' से रूपादि (गुणों) की उत्पत्ति होती है, उसी समय दोनों द्व्यणुकों के समवायिकारण पार्थिव और जलीय परमाणु और (पार्थिव द्व्यणुक के) अकारण जलीय परमाणु और (जलीय द्व्यणुक के अकारण) पार्थिव परमाणु इन दोनों (कारणाकारण) के एक ही संयोग