वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
Page 316 of 759
Read in context३५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् कारणगतात् संयोगादितरेतरकार्याकार्यगतौ संयोगौ युगपदुत्पद्येते । रूपादि की उत्पत्ति होती है, उसी समय दोनों द्व्यणुकों के कारण और अकारण (अर्थात् जलीय द्व्यणुक के कारण जलीय परमाणु और अकारण पार्थिव परमाणु एवं पार्थिव द्व्यणुक के कारण पार्थिव परमाणु एवं अकारण जलीय परमाणु इन) दोनों में रहनेवाले एक ही संयोग से एक ही समय कार्य और अकार्य (अर्थात् पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक और पार्थिव परमाणु के अकार्य जलीय द्व्यणुक इन दोनों के) संयोग एवं जलीय परमाणु के कार्य जलीय द्व्यणुक एवं अकार्य पार्थिव परमाणु, इन दोनों के संयोग, इन दोनों संयोगों की उत्पत्ति होती है । (इस प्रकार एक संयोग से दो संयोगों न्यायकन्दली दितरेतरकार्याकार्यगतौ संयोगौ युगपदुत्पद्येते । इतरेतरे पार्थिवाप्ये द्व्यणुके, तयोः कारणाकारणे परस्परसंयुक्तौ पार्थिवाप्यपरमाणू, पार्थिवः परमाणुरितरस्य पार्थिवद्व्यणु- कस्य कारणमितरस्याप्यस्य द्व्यणुकस्याकारणम् । एवमाप्यपरमाणुरितरस्याप्यद्व्यणुकस्य कारणमितरस्य पार्थिवद्व्यणुकस्याकारणम् । तयोः संयोगाद् इतरस्य पार्थिवपरमाणोर्यत् कार्यं पार्थिवं द्व्यणुकमकार्यञ्चाप्यः परमाणुः, तयोः संयोगो भवति । एवमितरस्याप्यपर- माणोर्यत् कार्यमाप्यं द्व्यणुकमकार्यस्तु पार्थिवः परमाणुस्तयोरपि संयोगो भवतीत्येकस्माद् द्वयोरुत्पत्तिः । से दोनों के कार्य (अर्थात्) पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक और जलीय परमाणु के कार्य (जलीय द्व्यणुक) एवं दोनों परमाणुओं के अकार्य (अर्थात् पार्थिव परमाणु के अकार्य जलीय द्व्यणुक एवं जलीय परमाणु के अकार्य पार्थिव द्व्यणुक) इन दोनों के एक ही संयोग की उत्पत्ति होती है । 'इतरेतर' शब्द से परस्पर सम्बद्ध पार्थिव द्व्यणुक और जलीय द्व्यणुक, ये ही दोनों अभिप्रेत हैं । इन दोनों के कारण और अकारण अर्थात् पार्थिव द्व्यणुक के कारण पार्थिव परमाणु और अकारण जलीय परमाणु एवं जलीय द्व्यणुक के कारण जलीय परमाणु और अकारण पार्थिव परमाणु, कथित कारण और अकारण इन दोनों के संयोग से 'इतर' अर्थात् पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक और अकार्य जो जलीय परमाणु, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । एवं 'इतर' जो जलीय परमाणु के कार्य जलीय द्व्यणुक एवं अकार्य जो पार्थिव परमाणु, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार एक ही संयोग से (संयोगज) संयोगों की उत्पत्ति होती है ।