वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३५७ प्रशस्तपादभाष्यम् किं कारणम् ? कारणसंयोगिना ह्यकारणेन कार्यमवश्यं संयुज्यत इति न्यायः । अतः पार्थिवं द्व्यणुकं कारणसंयोगिनाप्येनाणुना सम्बद्ध्यते । आप्यमपि द्व्यणुकं कारणसंयोगिना पार्थिवेनेति । अथ द्व्यणुकयोरितरेतरकारणाकारणसम्बद्धयोः कथं परस्परतः की एक ही समय उत्पत्ति होती है ।) (प्र.) (एक कारण से दो कार्यों की उत्पत्ति) क्यों होती है ? (उ.) चूँकि यह नियम है कि समवायिकारण के संयोग से युक्त अकारण (द्रव्य) के साथ (उस समवायिकारण का) कार्य भी अवश्य ही संयुक्त होता है, अतः पार्थिव द्व्यणुक उस जलीय परमाणु के साथ भी संयुक्त होता है, जिसका संयोग उक्त पार्थिव परमाणु के साथ है । (प्र.) एक-दूसरे के कारण और अकारण के साथ सम्बद्ध इन दोनों द्व्यणुकों में परस्पर संयोग न्यायकन्दली किं कारणम् ? पार्थिवाप्ययोर्द्व्यणुकयोर्विजातीयपरमाणुसंयोगे किं प्रमाणम् ? इति पृष्टः सन् प्रमाणमाह-कारणसंयोगिनेति । पार्थिवपरमाणुराप्यद्व्यणुकेन सह सम्बद्ध्यते, तत्कारणसंयोगित्वात् पटसंयुक्ततुरीवत् । एवमाप्यं परमाणुमपि पक्षीकृत्य वक्तव्यम् । यतः कारणसंयोगिना कार्यं संयुज्यते, अतः पार्थिवं द्व्यणुकं कारणसंयोगिनाप्येन परमाणुना सम्बध्यते, आप्यं च द्व्यणुकं तस्य कारणसंयोगिना पार्थिवपरमाणुनेत्युपसंहारः । अथ पार्थिवाप्यद्व्यणुकयोरितरेतरकारणाकारणसम्बद्धयोः कथं सम्बन्धः ? पार्थिवद्व्यणुकस्य स्वकीयाकारणेनाप्यद्व्यणुककारणेनाप्यपरमाणुना 'किं कारणम् ?' इत्यादि से प्रश्न करते हैं कि क्या कारण है ? अर्थात् पार्थिव द्व्यणुक और जलीय द्व्यणुक इन दोनों का अपने से भिन्न जाति के परमाणुओं के (पार्थिव द्व्यणुक का जलीय परमाणु के साथ एवं जलीय द्व्यणुक का पार्थिव परमाणु के साथ) जो संयोग की उत्पत्ति होती है, इसमें क्या कारण है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'कारणसंयोगिना' इत्यादि सन्दर्भ से देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार तन्तु में संयुक्त तुरी के साथ पट भी संयुक्त होता है, उसी प्रकार पार्थिव परमाणु भी जलीय द्व्यणुक के साथ संयुक्त होता है; क्योंकि जलीय द्व्यणुक के कारणीभूत जलीय परमाणु के साथ वह (पार्थिव परमाणु) संयुक्त है । इसी प्रकार जलीय परमाणु को भी पक्ष बनाकर अनुमान करना चाहिए । (अर्थात् जिस प्रकार कपाल में संयुक्त दण्ड के साथ घट भी संयुक्त होता है, उसी प्रकार जलीय परमाणु भी पार्थिव द्व्यणुक के साथ संयुक्त होता है; क्योंकि पार्थिव द्व्यणुक के कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ उसका संयोग है) इस प्रसङ्ग का सार मर्म यह है कि जिस द्रव्य के साथ कारण का संयोग रहता है, उस द्रव्य के साथ कार्य भी अवश्य ही संयुक्त होता है । अतः प्रकृत में पार्थिव द्व्यणुक जलीय परमाणु के साथ