भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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३५८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् सम्बन्धः ? तयोरपि संयोगजाभ्यां संयोगाभ्यां सम्बन्ध इति। नास्त्यजः संयोगो नित्यपरिमण्डलवत्, पृथगनभिधानात् । यथा चतुर्विधं परिमाणमुत्पाद्यमुक्त्वाह नित्यं परिमण्डलमित्येवमन्यतरकर्मजादि- किसी कारण से उत्पन्न होता है ? (उ.) इन दोनों द्वयणुक़ों में भी दोनों संयोगज 1 संयोगों से ही उक्त संयोग की उत्पत्ति होती है । अनुत्पत्तिशील संयोग कोई है ही नहीं; क्योंकि सूत्रकार ने नित्य परिमण्डल (नित्य अणुपरिमाण) की तरह नित्य संयोग का उल्लेख नहीं किया है, अर्थात् सूत्रकार ने जिस प्रकार उत्पत्तिशील चार परमाणुओं के उल्लेख के बाद 'नित्यं परिमण्डलम्' इत्यादि से नित्य अणुपरिमाण का उल्लेख किया है, न्यायकन्दली सम्बद्धस्याप्यद्व्यणुकस्यापि स्वकीयाकारणेन पार्थिवद्व्यणुककारणेन पार्थिवपरमाणुना सम्बद्धस्य कथं सम्बन्धः ? इति पृच्छति । उत्तरमाह - तयोरपीति । पार्थिवद्व्यणुकस्याप्येन परमाणुना यः संयोगजः संयोगो यश्चाप्यद्व्यणुकस्य पार्थिवपरमाणुना संयोगजः संयोगास्ताभ्यां पार्थिवाप्यपरमाणुसंयोगाभ्यां द्व्यणुकयोः परस्परसंयोगः । अत्रापि पूर्वोक्त एव न्यायः, कारणसंयोगिना अकारणेन संयोगि कार्यमिति । संयुक्त होता है; क्योंकि उसके कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ जलीय परमाणु संयुक्त है । इसी तरह जलीय द्वयणुक भी अपने कारणीभूत जलीय परमाणु से संयुक्त पार्थिव परमाणु के साथ संयुक्त होता है । (प्र.) इतरेतर कारणों और अकारणों में परस्पर असम्बद्ध पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक़ों में परस्पर संयोग कैसे होता है ? अर्थात् यह पूछते हैं कि पार्थिव द्वयणुक अपने अकारणीभूत और जलीय द्वयणुक के कारणीभूत जलीय परमाणु के साथ संयुक्त है एवं जलीय द्वयणुक अपने अकारणीभूत और पार्थिव द्वयणुक के कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ संयुक्त है, फिर इससे पार्थिव और जलीय दोनों द्वयणुक़ों में परस्पर संयोग कैसे होता है ? 'तयोः' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं । अभिप्राय यह है कि पार्थिव द्वयणुक का जलीय परमाणु के साथ जो संयोगज संयोग है एवं जलीय द्वयणुक का पार्थिव परमाणु के साथ जो संयोगज संयोग है, इन दोनों संयोगज संयोगों से ही कथित पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक इन दोनों में परस्पर संयोग की उत्पत्ति होती है । इस संयोग के प्रसङ्ग में भी पूर्वकथित वही न्याय लागू होता है कि जिस कार्य के कारण का जिस अकारण के साथ संयोग होगा, उस अकारण के साथ उस कार्य का भी संयोग अवश्य ही होगा ।

  1. अर्थात् पार्थिव परमाणु और जलीय परमाणु के संयोग से उत्पन्न पार्थिव द्वयणुक का जलीय परमाणु के साथ संयोग और जलीय द्वयणुक का पार्थिव परमाणु के साथ संयोग, इन दोनों संयोगज संयोगों से पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक इन दोनों में संयोग की उत्पत्ति होती है ।