भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४४९ न्यायकन्दली पुनरस्योपादानं पूर्वस्मान्निर्विकल्पकक्रमादिदं प्रक्रमान्तरमित्यवद्योतनार्थम् । सविकल्पकमर्थे न प्रमाणमिति कथमुच्यते ? प्रतीयते हि घटोऽयमिति ज्ञाने विच्छिन्नः कम्बुग्रीवात्मा सर्वतो व्यावृत्तः पदार्थः । अनर्थजप्रतिभासो विकल्पस्तस्मादर्थाध्यवसायी भ्रान्त इति चेत्? यथोक्तम्- "विकल्पो वस्तुनिर्भासाद् विसंवादादुपप्लवः"। इति । न, प्रवृत्तौ संवादात् । अथानुभवजन्मा विकल्पोऽर्थात्मतदारोपितस्वप्रतिभासः स्वलक्षणस्वप्रतिभासयोर्भेदं तिरोधाय स्वलक्षणदेशे पुरुषं प्रवर्तयति संवादयति च, मणि- प्रभायां मणिबुद्धिवत् पारम्पर्येणार्थप्रतिबन्धादर्थप्राप्तेरिति चेत्? यदि विकल्पो वस्तु न संस्पृशति, कथं तदात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयेत्? न ह्यप्रतीते मरुमरीचिनिचये तदधि- करणे जलसमारोपो दृष्टः । अथ प्रत्यक्षपृष्ठभावी विकल्पः करणव्यापारमुपाददानोऽर्थक्रियासमर्थं वस्तु साक्षात्करोति, अन्यथार्थक्रियार्थिनो विकल्पतः प्रवृत्त्ययोगात् । यथाह- "ततोऽपि विकल्पाद् वस्तुन्येव प्रवृत्तिः" इति । एवं तर्हि वस्तुनि प्रमाणम्, तत्राविसंवादिप्रतीतिहेतुत्वात् । अथ मन्यसे यः क्षणः प्रत्यक्षेण गृह्यते, प्रत्यक्ष हैं । (निर्विकल्पक ज्ञान के प्रसङ्ग में कथित) चतुष्टय संनिकर्ष से ही यद्यपि आत्मा और मन के संनिकर्ष का लाभ हो जाता है; फिर भी 'यह आरम्भ निर्विकल्पक ज्ञान के उपक्रम से सर्वथा भिन्न है' यह दिखलाने के लिए ही अलग से यहाँ भी आत्मा और मन के संनिकर्ष का उपादान किया गया है । (उ.) किस युक्ति के द्वारा यह कहते हैं कि सविकल्पक ज्ञान अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण नहीं है ? क्योंकि 'घटोऽयम्' इस सविकल्पक ज्ञान में पटादि अन्य सभी पदार्थों से भिन्न कम्बुग्रीवादिमत् स्वरूप एक विलक्षण वस्तु भासित होता है । (प्र.) जो ज्ञान विना अर्थ के भी उत्पन्न हो, उसे 'विकल्प' कहते हैं । उससे जो (सविकल्पक नाम का) अध्यवसाय उत्पन्न होगा, वह भी अवश्य ही भ्रान्त होगा । जैसा कहा गया है कि-विशिष्ट वस्तु को समझाने के कारण ही ज्ञान सविकल्पक होता है । किन्तु उससे होनेवाली प्रवृत्तियाँ विफल होती हैं, अतः सविकल्पक ज्ञान भ्रान्तिरूप है । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ सफल (भी) होती हैं । (प्र.) पहिले (निर्विकल्पक) अनुभव से उत्पन्न होनेवाले सविकल्पक अनुभव में उसके विषय के अभेद का आरोप होता है, इसके बाद इस .आरोप के कारण उसका घटादि विषयरूप से ही प्रतिभास होता है । इस प्रकार सविकल्पक अनुभव में भासित होनेवाले विषयों की प्रवृत्ति सफल होती है (किन्तु प्रवृत्ति की इस सफलता से सविकल्पक ज्ञान में प्रामाण्य की सिद्धि नहीं की जा सकती) । (उ.) (इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि) अगर सविकल्पक ज्ञान का अपने विषय के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है, तो फिर वह विषय में अपने प्रति- भास का आरोप ही कैसे कर सकता है ? क्योंकि अज्ञात मरु-मरीचिका में तो जल का