भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२१ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रामाण्यम्" (वै.अ. १ आ. १ सू. ३) "लिङ्गाच्चानित्य बुद्धपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" (वै. अ. ६ आ. १ सू. ९) "बुद्धिपूर्वो ददातिः" (वै. अ. ६ आ. १ सू. ३) इत्युक्तत्वात् । बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे", "बुद्धिपूर्वो ददातिः" इत्यादि सूत्रों के द्वारा कही गयी है । न्यायकन्दली प्रामाण्यावबोधेन विसंवादप्रतीतेरपि सम्भवात् । यत्र च सर्वेषां संवादनियमस्तत्प्रमाणमेव, यथा प्रत्यक्षादिकम् । प्रमाणं वेदः, सर्वेषामविसंवादिज्ञानहेतुत्वात्, प्रत्यक्षवत् । यत्तु दृष्टार्थेषु कर्मस्वनुष्ठानात् क्वचित् फलादर्शनं न तदस्य प्रामाण्यं प्रतिक्षिपति, सामग्री- वैगुण्यनिबन्धनत्वात् । तन्निबन्धनत्वं च यथावत्सामग्रीसम्भवे सति फलदर्शनात् । आप्तोक्तत्वादान्नायस्येति न युक्तम्, तदर्थानुष्ठानकालेऽभियुक्तैरनुष्ठा- तृभिः स्मृत्ययोग्यस्य कर्तुरस्मरणादभावसिद्धेरत आह-लिङ्गाच्चानित्य इति । तद्वचनादाम्नायप्रामाण्यमित्यत्रोक्तमाम्नायपदं प्रकृतत्वादिह सम्बध्यते, लिङ्गा- दान्नायोऽनित्यो गम्यत इत्यर्थः । लिङ्गमुपन्यस्यति - बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे इति । प्रमाण । अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों की तरह वेद भी सभी व्यक्तियों में प्रमा ज्ञान का ही उत्पादक होने के कारण प्रमाण ही है । यह जो कोई आक्षेप करते हैं कि 'वेदों के द्वारा निर्दिष्ट अनुष्ठानों में से कुछ निष्फल भी होते हैं, जिससे निःशङ्क प्रामाण्य का विघटन होता है', यह आक्षेप तो उन अनुष्ठानों की यथा- विहित सामग्री में वैगुण्य की कल्पना करके भी हटाया जा सकता है । 'उन अनुष्ठानों के विधान के अनुसार सामग्री का सम्बलन नहीं था' यह इसी से समझ सकते हैं कि विधान के अनुसार सामग्री के द्वारा जो अनुष्ठान किया जाता है, वह अवश्य ही सफल होता दीखता है । (प्र.) आम्नाय (वेद) आप्तों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं है; क्योंकि अनुष्ठान के समय अनुष्ठाताओं को वेदों के कर्त्ता का स्मरण नहीं होता है, अतः सत्ता के न रहने के कारण वे स्मृति के अयोग्य हैं ? इसी प्रश्न के समाधान के लिए 'लिङ्गाच्चानित्यः' इस सूत्र का उल्लेख किया गया है । इस सूत्र के पूर्ववर्ती 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' इस सूत्र के 'आम्नाय' पद को प्रकृत में उपयुक्त होने के कारण 'लिङ्गाच्चानित्यः' इस सूत्र में अनुवृत्त समझना चाहिए । तदनुसार इस सूत्र का यह अर्थ होता है कि हेतु से आम्नाय को अनित्य समझना चाहिए (अर्थात् हेतु से वेद में अनित्यत्व का अनुमान करना चाहिए) । 'बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे' इस सूत्र के उल्लेख के द्वारा वेद में अनित्यत्व के साधक हेतु का ही निर्देश किया गया है । उक्त सूत्र का 'वाक्यकृतिः' शब्द 'वाक्यस्य कृतिः' इस समास

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