भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 536

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७१ न्यायकदली प्रत्यक्षप्रामाण्याभ्युपगमेन प्रवर्त्तमानं प्रतिषेधानुमानं तद्विपरीतवृत्ति तेनैव बाध्यते, विषयापहारात् । को विषयस्यापहारः ? तद्विपरीतार्थप्रवेदनम्, तस्मिन् सत्यनुमानस्य किं भवति ? उत्पत्त्यभावः, प्रथमप्रवृत्तेनाबाधितविषयप्रत्यक्षेण वह्नेरुष्णत्वे प्रतिपादिते तत्प्रतीत्यवरुद्धे च तस्यानुष्णत्वप्रतीतिर्न भवति । हेतोरप्ययमेव बाधो यदयमनुष्णत्वप्रतिपादनाय प्रयुक्तः, तत्प्रतीतिं न करोति, प्रत्यक्षविरोधात् । यथोक्तम्- वैपरीत्यपरिच्छेदे नावकाशः परस्य तु । मूले तस्य ह्यनुत्पन्ने पूर्वेण विषयो हतः ॥ इति । बाधाविनाभावयोर्विरोधादविनाभूतस्य बाधानुपपत्तिरिति चेत् ? यदि त्रैरूप्यमविनाभावोऽभिमतः ? तदास्त्येवाविनाभूतस्य बाधः, यथानुष्णोऽग्निः लिए उस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य स्वीकार कर ही लिया जाता है, अतः उक्त स्वीकृति से प्रवृत्त होनेवाले वह्नि में उष्णता के प्रतिषेध का अनुमान उस प्रत्यक्ष से ही बाधित हो जाता है, जो प्रकृत प्रतिषेध के विरोधी उष्णता का ज्ञापक है; क्योंकि इस प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के विषयरूपी उष्णता के प्रतिषेध का अपहरण कर लिया जाता है । (प्र.) विषय का यह 'अपहरण' क्या वस्तु है ? (उ.) प्रकृत अनुमान के द्वारा ज्ञाप्य विषय के विरोधी विषय का ज्ञापन ही प्रकृत में विषय का अपहरण है । (प्र.) इस विषयापहरण से अनुमान के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है ? (उ.) यही कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती; किन्तु उष्णता के बोधक प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति अनुष्णत्व के अनुमान से पहले होती है, उसका विषय उष्णत्व किसी दूसरे प्रमाण से बाधित भी नहीं है, अतः इस प्रत्यक्ष के द्वारा जब वह्नि में उष्णता की प्रतिपत्ति हो जाती है, उसके बाद उस प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात वह्नि में अनुष्णता की प्रतीति नहीं होती है । हेतु में बाध की प्रतीति का भी यही रहस्य है कि वह्नि में अनुष्णत्व को समझाने के लिए प्रयुक्त होने पर भी इस प्रत्यक्षविरोध के कारण वह्नि में उष्णता की प्रतीति का उत्पादन नहीं कर सकता । जैसा कहा गया है कि विपरीत (अभाव) विषयक निश्चय के उत्पन्न हो जाने पर उसके विरोधी के ज्ञान का अवकाश नहीं रह जाता, क्योंकि उसके उत्पन्न होने के पहले ही पहले के प्रमाण से उसके विषय का अपहरण हो जाता है । (प्र.) साध्य की व्याप्ति और साध्य का अभाव ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः साध्य का व्याप्य हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता । (उ.) व्याप्ति या अविनाभाव को यदि हेतु में (पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व इन) तीनों रूपों का रहना समझें, तो फिर इन तीनों रूपों के रहने पर भी हेतु में 'बाध' रह ही सकता है; क्योंकि 'अग्निरनुष्णः कृतकत्वात्' इस स्थल में कृतकत्व रूप हेतु में उक्त तीनों रूप हैं ।