भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 727

७६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली संसर्गविषयः । तदध्यवसाय एव स्वलक्षणाध्यवसायः, तदात्मतया तस्य समारोपात् । अन्यव्यावृत्तिस्वभावं भावाभावसाधारणं चेदम्, गौरस्ति नास्तीति प्रयोगात् । भावा- त्मकत्वे ह्यस्य गौरस्तीति प्रयोगासम्भवः, पुनरुक्तत्वात् । नास्तीति च न प्रयुज्यते, विरोधात् । एवं तस्याभावात्मकत्वे नास्तीति पुनरुक्तम्, अस्तीति विरुध्यते । यथोक्तम्- घटो नास्तीति वक्तव्यं सन्नेव हि यतो घटः । नास्तीत्यपि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्तयोः ॥ इति । एतस्मादेव च भिन्नानामपि व्यक्तीनामेकतावभासः । इदं हि सर्वेषामेव विकल्पानां विषयोऽस्यैकत्वाद् विकल्पानामप्येकत्वम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कारणानां का (सङ्केतरूप) संसर्ग होता है । शब्द से उसी का व्यवहार होता है एवं उसी का बाह्य अर्थरूप में भी व्यवहार होता है, उसे ही 'स्वलक्षण' भी कहते हैं । इसी 'स्वलक्षणाध्यवसाय' रूप से उसका आरोप होता है । इस (अर्द्धपञ्चमाकार) का अध्यवसाय ही 'स्वलक्षणाध्यवसाय' कहा जाता है; क्योंकि विकल्प का इसी रूप से आरोप होता है । यह (अपोह) अन्यव्यावृत्ति स्वभाव का है, अर्थात् इसका स्वभाव है कि अपने विषय को अन्यों से भिन्न रूप में समझावे । एवं भाव और अभाव दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान रूप से रहना भी इसका स्वभाव है; क्योंकि 'गौरस्ति' और 'गौर्नास्ति' ये दोनों ही प्रकार के प्रयोग होते हैं । यदि यह केवल भावरूप ही होता, तो फिर पुनरुक्ति के कारण 'गौरस्ति' यह प्रयोग सम्भव न होता। 'गौर्नास्ति' यह प्रयोग भी नहीं हो सकता; क्योंकि अस्तित्व और नास्तित्व दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । इसी प्रकार इसको केवल अभावरूप ही मानें तो 'गौर्नास्ति' यह प्रयोग पुनरुक्ति के कारण नहीं हो सकेगा और 'गौरस्ति' यह प्रयोग विरोध के कारण असम्भव होगा । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि- 1"यतः घट सत् है, अतः 'घटोऽस्ति' यह प्रयोग ठीक नहीं है (क्योंकि इससे पुनरुक्ति होती है) । 'घटो नास्ति' यह प्रयोग भी ठीक नहीं है; क्योंकि (घटशब्द से बोध्य) सत्त्व और (नास्तिशब्द से बोध्य) असत्त्व दोनों परस्पर विरोधी हैं ।" इसी (अर्द्धपञ्चमाकार) से विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । यही सभी विकल्पों का विषय है और इसी की एकता से सभी विकल्पों में भी एकता की प्रतीति होती है । विकल्पों के एकत्व से ही उसके कारणीभूत एवं प्रत्येक पिण्ड

  1. यह श्लोक मुद्रित पुस्तक में 'घटो नास्तीति वक्तव्यम्' इस प्रकार से मुद्रित है; किन्तु विषय विवेचन की दृष्टि से 'घटोऽस्तीति न वक्तव्यम्' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है । यह पाठ पाठान्तरों की सूची में भी है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।