भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५७] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५९


तदुत्तिष्ठ व्रजामोऽद्य तीर्थमौजसमव्ययम्।<br>कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यामभिषिञ्चाम षण्मुखम्॥ ५१<br>सेनायाः पतिरस्त्वेष देवगन्धर्वकिंनराः।<br>महिषं घातयत्वेष तारकं च सुदारुणम्॥ ५२<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वः समुत्तस्थुः सुरास्ततः।<br>कुमारसहिता जग्मुः कुरुक्षेत्रं महाफलम्॥ ५३<br>तत्रैव देवताः सेन्द्रा रुद्रब्रह्मजनार्दनाः।<br>यत्नमस्याभिषेकार्थं चक्रुर्मुनिगणैः सह॥ ५४तो आप उठें। अब हमलोग अविनाशी औजस तीर्थको चलें। कुरुक्षेत्रमें चलकर सरस्वती (नदी)-में हमलोग षण्मुखका अभिषेक करें। देवो, गन्धर्वो और किन्नरो! ये हमारे सेनापति बनें और महिष तथा भयंकर तारकका संहार करें। शङ्करने कहा—बहुत अच्छा। उसके बाद सभी देवता उठे और कुमारके साथ महान् फलदायी कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहीं मुनियोंके साथ इन्द्र, रुद्र, प्रजापति ब्रह्मा, जनार्दन आदि समस्त देवताओंने उस कुमारके अभिषेकका उपाय किया॥ ५१—५४॥
ततोऽम्बुना सप्तसमुद्रवाहिनी<br>  नदीजलेनापि महाफलेन।<br>वरौषधीभिश्च सहस्त्रमूर्तिभि-<br>  स्तदाभ्यषिञ्चन् गुहमच्युताद्याः॥ ५५<br><br>अभिषिञ्चति सेनान्यां कुमारे दिव्यरूपिणि।<br>जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ५६<br><br>अभिषिक्तं कुमारं च गिरिपुत्री निरीक्ष्य हि।<br>स्नेहादुत्सङ्गं स्कन्दं मूर्ध््न्यजिघ्रन्मुहुर्मुहुः॥ ५७<br><br>जिघ्रती कार्तिकेयस्य अभिषेकार्द्रमाननम्।<br>भात्यद्रिजा यथेन्द्रस्य देवमाताऽदितिः पुरा॥ ५८उसके बाद अच्युत (विष्णु) आदि देवताओंने (सरस्वतीके तथा) सातों समुद्रोंमें मिलकर बहनेवाली नदियोंके महान् फलदायक जलसे एवं सहस्रों प्रकारकी उत्तमोत्तम ओषधियोंसे गुहका (सेनापतिके पदपर) अभिषेक किया। दिव्य रूप धारण करनेवाले सेनापति कुमारके अभिषिक्त हो जानेपर गन्धर्वराज गाने लगे एवं अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गिरिजाने कुमारको अभिषिक्त देखकर स्नेहसे गोदमें ले लिया और वे बार-बार उनके सिरको सूँघने लगीं। अभिषेकसे आर्द्र हुए कार्तिकेयके मुखको (आशीर्वाद देनेकी प्रक्रियामें) सूँघती हुई पार्वती पूर्वकालमें (आशीर्वाद देती हुई) इन्द्रके मुखको सूँघनेवाली देवमाता अदिति-जैसी सुशोभित हुईं॥ ५५—५८॥
तदाऽभिषिक्तं तनयं दृष्ट्वा शर्वो मुदं ययौ।<br>पावकः कृत्तिकाश्चैव कुटिला च यशस्विनी॥ ५९<br><br>ततोऽभिषिक्तस्य हरः सेनापत्ये गुहस्य तु।<br>प्रमथांश्चतुरः प्रादाच्छक्रतुल्यपराक्रमान्॥ ६०<br><br>घण्टाकर्णं लोहिताक्षं नन्दिसेनं च दारुणम्।<br>चतुर्थं बलिनां मुख्यं ख्यातं कुमुदमालिनम्॥ ६१<br><br>हरदत्तान् गणान् दृष्ट्वा देवाः स्कन्दस्य नारद।<br>प्रददुः प्रमथान् स्वान् स्वान् सर्वे ब्रह्मपुरोगमाः॥ ६२उस समय शङ्कर, पावक, कृत्तिकाएँ एवं यशस्विनी कुटिला (-ये सभी) अपने पुत्रको अभिषिक्त देखकर अत्यन्त हर्षित हुए। उसके बाद शङ्करने सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किये गये गुहको इन्द्रके सदृश शक्तिवाले चार प्रमथों—घण्टाकर्ण, लोहिताक्ष, दारुण नन्दिसेन और चौथे बलवानोंमें श्रेष्ठ विख्यात कुमुदमालीको दिया। नारदजी! शङ्करद्वारा दिये गये गणोंको देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने (सेनापति) स्कन्दके लिये अपने-अपने प्रमथोंको (भी) दे दिया॥ ५९—६२॥
स्थाणुं ब्रह्मा गणं प्रादाद् विष्णुः प्रादाद् गणत्रयम्।<br>संक्रमं विक्रमं चैव तृतीयं च पराक्रमम्॥ ६३<br><br>उत्केशं पङ्कजं शक्रो रविर्दण्डकपिङ्गलौ।<br>चन्द्रो मणिं वसुमणिमश्विनौ वत्सनन्दिनौ॥ ६४ब्रह्माने अपने गण स्थाणुको दिया और विष्णुने संक्रम, विक्रम और पराक्रम नामके तीन गणोंको दिया। इन्द्रने उत्केश और पङ्कजको, रविने दण्डक और पिङ्गलको, चन्द्रमाने मणि एवं वसुमणिको, अश्विनीकुमारोंने वत्स और नन्दीको दिया।