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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 314 में से

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शक्तिद्वय-निरूपण १७७ रूप में ये सुख-दुःख आदि आत्मा के धर्म होते ही नहीं हैं। ये तो वस्तुतः शरीर के धर्म हैं। आत्मा इनसे लिप्त नहीं होता है। अज्ञान की आवरणशक्ति आत्मा से इसी वस्तुस्थिति को छिपा लेती है। वेदान्त की दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म अथवा आत्मसत्त्व ही सत् है, सम्पूर्ण नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है, फिर भी वास्तविकता का ज्ञान न होने से अज्ञानी लोगों की सांसारिकबुद्धि बनी रहती है। इस बुद्धि का एकमात्र कारण यहाँ अज्ञान को बताया गया है, क्योंकि इसकी 'आवरण' नामक शक्ति वस्तुतः वस्तुस्थिति को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् अज्ञान की दूसरी शक्ति 'विक्षेप' के विषय में कहते हैं। जब हम अपने सामने पड़ी हुई रस्सी को अन्धकार आदि के कारण सर्प समझ बैठते हैं, तब रस्सीविषयक अज्ञान पहले अपनी 'आवरण' नामक शक्ति से रस्सी के रस्सी होना रूप ज्ञान को आवृत करता है। तत्पश्चात् वही अज्ञान 'विक्षेप' नामक अपनी दूसरी शक्ति से उसी रस्सी में सर्पत्व की उद्भावना कर देता है और वही रस्सी हमें रस्सी होते हुए भी सर्प प्रतीत होने लगती है। यही अज्ञान की विक्षेपशक्ति का विक्षेपत्व है। ठीक उसीप्रकार आत्मविषयक अज्ञान पहले अपनी आवरण नामक शक्ति के सामर्थ्य से नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के वास्तविकस्वरूप को ढक देता है। पुनः वही अज्ञान अपनी दूसरी शक्ति 'विक्षेप' का प्रयोग करके सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त आकाश आदि सम्पूर्णप्रपञ्चरूप तुच्छ स्थूलसृष्टि की उद्भावना कर देता है। इसप्रकार उद्भावित यह स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण नामरूपात्मकसंसार वस्तुतः अज्ञान की विक्षेपशक्ति का ही प्रभाव है, जो वस्तुतः विनाशशील है। सीप में चांदी की प्रतीति तथा रज्जु में सर्प की भ्रान्ति के समान जो वस्तुतः मिथ्या है। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन उद्धृत करते हुए कहते हैं कि प्राचीन शास्त्रों में भी आत्मज्ञानी आचार्यों ने कहा है-कि अज्ञान की द्वितीय विक्षेपशक्ति ही लिङ्गशरीर (जिसे वेदान्त सूक्ष्मशरीर भी कहता है) सहित सम्पूर्णसृष्टि से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त स्थूलसृष्टिरूप दृश्यमान सम्पूर्ण संसार की संरचना करती है। विशेष-(1) ग्रन्थकार की शैली की विशेषता है कि वह अपने कथन की पुष्टि में श्रुति, स्मृति अथवा प्राचीन आचार्य आदि द्वारा कहे गये वचनों