BharatKosha
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 197 of 314

Read in context
Page 197

कारण-निरूपण १८३ इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का किए जाने पर कि अज्ञान में तो सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण विद्यमान हैं, फिर आपने यह कैसे कहा कि आकाशादि की उत्पत्ति तमोगुणप्रधान अज्ञान से आवृत चैतन्य से ही हुई? स्वयं ही इसप्रकार की शङ्का को मन में धारणकर अग्रिमपंक्ति में इसका समाधान प्रस्तुत करते हैं- कारण-कार्यसिद्धान्त के आधार पर कार्य के गुणों से कारण के गुणों का अनुमान सहज ही किया जा सकता है, क्योंकि आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन सभी में जड़भाग् की अधिकता के कारण ये जडरूप हैं। अतः इनमें तमोगुण की प्रधानता की परिकल्पना का औचित्य प्रतीत होता है। इस दृष्टि से यही कहना अधिक संगत होगा कि तमोगुणप्रधान विक्षेपशक्ति युक्त चैतन्य ही आकाशादिप्रपञ्च का कारण है। इस प्रसङ्ग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि इनकी उत्पत्ति के समय तमोगुण का आधिक्य रहता है, किन्तु सत्त्व एवं रजस् का पूर्णतया अभाव नहीं रहता, क्योंकि उनके अभाव में तो तमोगुण में क्रियाशीलता का अभाव ही हो जाएगा, जो उचित नहीं है। अतः इस अवस्था में सत्त्वगुण एवं रजोगुण, तमोगुण की तुलना में अत्यल्प मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इसका यही अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। इसप्रकार आकाश आदि की उत्पत्ति होने पर अपने-अपने कारण के गुण के अनुरूप ही उत्तरोत्तर उत्पन्न होने वाले उन आकाश आदि में सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों ही गुणों की विद्यमानता देखी जाती है। उत्पन्न हुए इन आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथिवी को अपञ्चीकृत, सूक्ष्मभूत एवं तन्मात्र इत्यादि नामों से जाना जाता है। इन पांचों में क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धरूप गुण अत्यन्तसूक्ष्म अर्थात् तन्मात्ररूप में ही विद्यमान रहते हैं। जो क्रमशः शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र एवं गन्धतन्मात्र कहलाते हैं। इन्हीं सूक्ष्मभूत अपञ्चीकृत आकाशादि से सूक्ष्मशरीर, पञ्चीकृतमहाभूत आदि की उत्पत्ति होती है तथा पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलशरीर उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार वेदान्त के अनुसार सृष्टि का क्रम प्रारम्भ होता है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया की ओर संकेत किया गया है।