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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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१८२ वेदान्तसार तदानीम् सत्त्व-रजस्-तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेषु आकाश-आदिषु उत्पद्यन्ते। एतानि एव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राणि अपञ्चीकृतानि च उच्यन्ते। एतेभ्यः सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि च उत्पद्यन्ते।।12।। अनुवाद-तमोगुण की प्रधानता वाली विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य से (सर्वप्रथम) आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है। “उसप्रकार के (अज्ञान से आच्छादित) इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है।) उन सबमें जड़ता की अधिकता दिखायी देने के कारण, उनके कारण (अज्ञानोपहितचैतन्य) का तमोगुणप्रधान होना (सिद्ध होता है।) उन आकाश आदि पञ्चभूतों में अपने-अपने (साक्षात्) कारणों के गुणों के आधार पर ही उससमय सत्त्व, रजस् और तमस् गुण (प्रधानरूप से) उत्पन्न होते हैं। (वेदान्त में) ये ही सूक्ष्मभूत, तन्मात्र और अपञ्चीकृत कहलाते हैं। इन्हीं (अपञ्चीकृतभूतों) से सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं। ‘चन्द्रिका’-वेदान्त के अनुसार अज्ञानोपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर से होने वाली सृष्टि के विषय में आचार्य सदानन्द कहते हैं कि यद्यपि प्रलयकाल में माया अथवा अज्ञान में सत्त्व, रजस् एवं तमोगुण की स्थित समानरूप से विद्यमान रहती है तथापि सृष्टि का प्रारम्भ होने की स्थिति में इन गुणों में गुणविशेष का न्यूनाधिक्य भी देखा जाता है। इसलिए तमोगुणप्रधान, किन्तु सत्त्व एवं रजस् गुणों की भी थोड़ी-बहुत सत्ता से युक्त विक्षेपशक्ति से सम्पन्न अज्ञान से आवृत चैतन्य, जिसे वेदान्त में ‘ईश्वर’ संज्ञा प्रदान की गई है, से सर्वप्रथम सूक्ष्मतन्मात्रारूप आकाश की सृष्टि होती है। पुनः उसी तन्मात्रारूप आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से सूक्ष्मतन्मात्रारूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है। इसप्रकार पञ्चभूतों के इन सूक्ष्मतन्मात्राओं की उत्पत्ति के कथन की पुष्टि में अपनी शैली के अनुसार ग्रन्थकार ‘तस्माद्वा’ इत्यादि श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि श्रुतियों में भी इस बात का उल्लेख हुआ है कि उसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न अज्ञान से आच्छादित इस शुद्धचैतन्यरूप आत्मा से ही आकाश की उत्पत्ति हुई है।