वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
१८२ वेदान्तसार तदानीम् सत्त्व-रजस्-तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेषु आकाश-आदिषु उत्पद्यन्ते। एतानि एव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राणि अपञ्चीकृतानि च उच्यन्ते। एतेभ्यः सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि च उत्पद्यन्ते।।12।। अनुवाद-तमोगुण की प्रधानता वाली विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य से (सर्वप्रथम) आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है। “उसप्रकार के (अज्ञान से आच्छादित) इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है।) उन सबमें जड़ता की अधिकता दिखायी देने के कारण, उनके कारण (अज्ञानोपहितचैतन्य) का तमोगुणप्रधान होना (सिद्ध होता है।) उन आकाश आदि पञ्चभूतों में अपने-अपने (साक्षात्) कारणों के गुणों के आधार पर ही उससमय सत्त्व, रजस् और तमस् गुण (प्रधानरूप से) उत्पन्न होते हैं। (वेदान्त में) ये ही सूक्ष्मभूत, तन्मात्र और अपञ्चीकृत कहलाते हैं। इन्हीं (अपञ्चीकृतभूतों) से सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं। ‘चन्द्रिका’-वेदान्त के अनुसार अज्ञानोपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर से होने वाली सृष्टि के विषय में आचार्य सदानन्द कहते हैं कि यद्यपि प्रलयकाल में माया अथवा अज्ञान में सत्त्व, रजस् एवं तमोगुण की स्थित समानरूप से विद्यमान रहती है तथापि सृष्टि का प्रारम्भ होने की स्थिति में इन गुणों में गुणविशेष का न्यूनाधिक्य भी देखा जाता है। इसलिए तमोगुणप्रधान, किन्तु सत्त्व एवं रजस् गुणों की भी थोड़ी-बहुत सत्ता से युक्त विक्षेपशक्ति से सम्पन्न अज्ञान से आवृत चैतन्य, जिसे वेदान्त में ‘ईश्वर’ संज्ञा प्रदान की गई है, से सर्वप्रथम सूक्ष्मतन्मात्रारूप आकाश की सृष्टि होती है। पुनः उसी तन्मात्रारूप आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से सूक्ष्मतन्मात्रारूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है। इसप्रकार पञ्चभूतों के इन सूक्ष्मतन्मात्राओं की उत्पत्ति के कथन की पुष्टि में अपनी शैली के अनुसार ग्रन्थकार ‘तस्माद्वा’ इत्यादि श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि श्रुतियों में भी इस बात का उल्लेख हुआ है कि उसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न अज्ञान से आच्छादित इस शुद्धचैतन्यरूप आत्मा से ही आकाश की उत्पत्ति हुई है।
कारण-निरूपण १८३ इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का किए जाने पर कि अज्ञान में तो सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण विद्यमान हैं, फिर आपने यह कैसे कहा कि आकाशादि की उत्पत्ति तमोगुणप्रधान अज्ञान से आवृत चैतन्य से ही हुई? स्वयं ही इसप्रकार की शङ्का को मन में धारणकर अग्रिमपंक्ति में इसका समाधान प्रस्तुत करते हैं- कारण-कार्यसिद्धान्त के आधार पर कार्य के गुणों से कारण के गुणों का अनुमान सहज ही किया जा सकता है, क्योंकि आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन सभी में जड़भाग् की अधिकता के कारण ये जडरूप हैं। अतः इनमें तमोगुण की प्रधानता की परिकल्पना का औचित्य प्रतीत होता है। इस दृष्टि से यही कहना अधिक संगत होगा कि तमोगुणप्रधान विक्षेपशक्ति युक्त चैतन्य ही आकाशादिप्रपञ्च का कारण है। इस प्रसङ्ग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि इनकी उत्पत्ति के समय तमोगुण का आधिक्य रहता है, किन्तु सत्त्व एवं रजस् का पूर्णतया अभाव नहीं रहता, क्योंकि उनके अभाव में तो तमोगुण में क्रियाशीलता का अभाव ही हो जाएगा, जो उचित नहीं है। अतः इस अवस्था में सत्त्वगुण एवं रजोगुण, तमोगुण की तुलना में अत्यल्प मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इसका यही अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। इसप्रकार आकाश आदि की उत्पत्ति होने पर अपने-अपने कारण के गुण के अनुरूप ही उत्तरोत्तर उत्पन्न होने वाले उन आकाश आदि में सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों ही गुणों की विद्यमानता देखी जाती है। उत्पन्न हुए इन आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथिवी को अपञ्चीकृत, सूक्ष्मभूत एवं तन्मात्र इत्यादि नामों से जाना जाता है। इन पांचों में क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धरूप गुण अत्यन्तसूक्ष्म अर्थात् तन्मात्ररूप में ही विद्यमान रहते हैं। जो क्रमशः शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र एवं गन्धतन्मात्र कहलाते हैं। इन्हीं सूक्ष्मभूत अपञ्चीकृत आकाशादि से सूक्ष्मशरीर, पञ्चीकृतमहाभूत आदि की उत्पत्ति होती है तथा पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलशरीर उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार वेदान्त के अनुसार सृष्टि का क्रम प्रारम्भ होता है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया की ओर संकेत किया गया है।
१८४ वेदान्तसार (२) गद्यखण्ड के आरम्भ में उल्लिखित अज्ञान की विक्षेपशक्ति के साथ-साथ आवरणशक्ति का भी अध्याहार करना चाहिए, क्योंकि यही आवरण नामक शक्ति शुद्धचैतन्यरूप तत्त्व के वास्तविकरूप को आवृत करती है। (३) सृष्टिक्रम में यहाँ सर्वप्रथम सूक्ष्म आकाश की उत्पत्ति को मान्यता प्रदान की गई है। (४) अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों को इस अवस्था में स्थूल इन्द्रियों द्वारा देखा नहीं जा सकता है। (५) इस अवस्था में इन सूक्ष्मभूतों में रूप, रस, गन्धादि गुण सूक्ष्मरूप में एवं स्वतन्त्ररूप में विद्यमान रहते हैं। (६) प्रस्तुत अंश के भाव को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-३९ विक्षेपशक्तिसम्पन्न तमोगुणप्रधान
┌─────────────────┐ │ अज्ञान से उपहित │ └────────┬────────┘ │ ( चैतन्य ) │ सूक्ष्मशरीराणि ── आकाश │ │ ┌───────────────────────┐ │ ├───> │ जाड्याधिक्या दर्शनात् │ ──> ( तमः प्राधान्यम् ) │ │ └───────────────────────┘ │ │ ▲ ▲ ▲ │ वायु ──────┘ │ │ │ │ │ │ │ अग्नि ──────────┘ │ │ │ │ उत्पद्यन्ते │ जल ─────────────────┘ ▲ │ │ पृथिवी ──────┬───────────────┐ सूक्ष्म महाभूतानि ◄────┘ │ │ सूक्ष्मभूत तन्मात्र अपञ्चीकृत └───────────┼──────────┘ कथ्यते
अवतरणिका—आकाशादि सूक्ष्मपञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति के पश्चात् इनमें भी सत्त्वादिगुणों की प्रधानता से सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर की सृष्टि का कथन करते हैं-
सूक्ष्म-शरीर निरूपण (सप्तदशावयव)
सूक्ष्मशरीर निरूपण १८५ सूक्ष्मशरीराणि सप्तदशावयवानि लिङ्गशरीराणि। अवयवास्तु ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं बुद्धिमन्सी कर्मेन्द्रियपञ्चकं वायुपञ्चकं चेति। ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। एतान्याकाशादीनां सात्त्विकांशेभ्योः व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते। बुद्धिर्नाम नि श्रयात्मिकान्तःकरणवृत्तिः। मनो नाम सङ्कल्पविकल्पात्मिकान्तः- करणवृत्तिः। अनयोरेव चित्ताहङ्कारयोरन्तर्भावः। एते पुनराकाशादिगतसात्त्विकांशेभ्यो मिलितेभ्य उत्पद्यन्ते। एतेषां प्रकाशात्मकत्वात्सात्त्विकांशकार्यत्वम्। इयं बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियैः सहिता विज्ञानमयकोशो भवति। अयं कर्तृत्वभोक्तृत्व- सुखित्वदुःखित्वाद्य- भिमानत्वेनेहलोकपरलोकगामी व्यावहारिको जीव इत्युच्यते। मनस्तु ज्ञानेन्द्रियैः सहितं सन्मनोमयकोशो भवति। पदच्छेद- सूक्ष्मशरीराणि सप्तदश-अवयवानि लिङ्गशरीराणि। अवयवाः तु ज्ञानेन्द्रियपञ्चकम्, बुद्धिमन्सी, कर्मेन्द्रियपञ्चकम्, वायुपञ्चकम् च इति। ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्र-त्वक्-चक्षुः-जिह्वा-घ्राण-आख्यानि। एतानि आकाश-आदीनाम् सात्त्विक-अंशेभ्यः व्यस्तेभ्यः पृथक्-पृथक् क्रमेण उत्पद्यन्ते। बुद्धिः नाम निश्चयात्मिका अन्तःकरणवृत्तिः। मनः नाम सङ्कल्प-विकल्पात्मिका अन्तःकरणवृत्तिः। अनयोः एव चित्त-अहङ्कारयोः अन्तर्भावः। एते पुनः आकाश-आदिगत-सात्त्विक-अंशेभ्यः मिलितेभ्यः उत्पद्यन्ते। एतेषाम् प्रकाशात्मकत्वात् सात्त्विकांश-कार्यत्वम्। इयम् बुद्धिः ज्ञानेन्द्रियैः सहिता विज्ञानमयकोशः भवति। अयम् कर्तृत्व- भोक्तृत्व - सुखित्वद् - दुःखित्व - आदिअभिमानत्वेन इहलोक-परलोकगामी व्यावहारिकः जीव इत्युच्यते। मनः तु ज्ञानेन्द्रियैः सहितम् सत् मनोमयकोशः भवति। अनुवाद-सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर ही लिङ्गशरीर है। पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, बुद्धि एवं मन, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ तथा पञ्चवायु ही इसके अवयव हैं। श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः जिह्वा और घ्राण नामक (पाँच) ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये आकाश आदि (सूक्ष्मभूतों) के सात्त्विक-अंशों से क्रमशः अलग-अलग उत्पन्न होते हैं। निश्चय करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति ही बुद्धि है। सङ्कल्प-विकल्प करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति वस्तुतः मन है। इन दोनों में ही चित्त और
१८६ वेदान्तसार अहंकार दोनों का अन्तर्भाव हो जाता है। ये सभी वस्तुतः आकाश आदि में स्थित सात्त्विक अंशों के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होते हैं। इनके प्रकाशात्मक होने के कारण (ही इन्हें) सात्त्विक अंशों का कार्य कहा गया है। पञ्चज्ञानेन्द्रियों सहित यह बुद्धि ही विज्ञानमयकोश होती है। यही (कोश) कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी आदि के अभिमानविषयकभाव के कारण, इसलोक एवं परलोक में आवागमन करने वाला, व्यावहारिकरूप में 'जीव' इसप्रकार कहा जाता है। जबकि ज्ञानेन्द्रियों से युक्त मन ही मनोमयकोश होता है। 'चन्द्रिका'-सूक्ष्मशरीर में कुल मिलाकर सत्रह अवयव होते हैं। इसी सूक्ष्मशरीर का दूसरा नाम लिङ्ग शरीर भी है। तत्पश्चात् ग्रन्थकार इन सत्रह अवयवों को गिनाते हैं-ये सत्रह अवयव इसप्रकार हैं-श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा तथा घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि दो अन्तरिन्द्रिय तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान ये पाँच वायु कुल मिलाकर सत्रह अवयव हो जाते हैं। तत्पश्चात् श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा एवं घ्राण इन पञ्चज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति को कहते हैं-ये सभी ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्मभूत आकाश आदि के सात्त्विक अंशों से क्रमशः अलग-अलग इसप्रकार उत्पन्न होते हैं। जैसे-आकाश के सात्त्विक अंश से 'श्रोत्र' नामक ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न होती है। इसका गुण 'शब्द' है। अतः यह शब्द को ग्रहण करने का कार्य करती है। इसीप्रकार वायु के सात्त्विक अंश से 'त्वक्' नामक ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न होती है। इसका गुण 'स्पर्श' है। अतः यह शीतोष्णादि का ज्ञान कराती है। इसके अतिरिक्त अग्नि के सात्त्विक अंश से 'चक्षु' की उत्पत्ति होती है। इसका गुण 'रूप' है। अतः यह ज्ञानेन्द्रिय दृश्यमानजगत् के 'दर्शन' में सहायिका होती है। जबकि जल के सात्त्विक अंश से जिह्वा अर्थात् 'रसना' नामक ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न होती है। 'रस' इसका गुण होने से यह मधुर, अम्ल लवण, कटु, कषाय एवं तिक्त इत्यादि षड्रसों को ग्रहण करती है। इसीप्रकार पृथ्वी के सात्त्विक अंश से 'घ्राण' नाम ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति मानी गई है। पृथ्वी का गुण 'गन्ध' होने से यह इन्द्रिय गन्ध को ग्रहण करने का कार्य करती है।
सूक्ष्मशरीर निरूपण १८७ पुनः बुद्धि एवं मन को परिभाषित करते हैं—'यह बात पूर्णरूप से ऐसी ही है' इसप्रकार निश्चय करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति 'बुद्धि' कहलाती है तथा 'यह ऐसा है अथवा नहीं' इसप्रकार संशय करने वाला अन्तःकरण का व्यापार ही 'मन' है। दूसरे शब्दों में अन्तःकरण की वृत्ति के दो रूप कहे जा सकते हैं (1) निश्चयात्मिकावृत्ति अर्थात् बुद्धि (2) संशयात्मिका वृत्ति अर्थात् मन। ग्रन्थकार के अनुसार—कुछ विद्वान् चित्त और अहंकार नामक अन्य दो वृत्तियों का उल्लेख भी करते हैं, किन्तु उन दोनों का क्रमशः इन्हीं बुद्धि और मन में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अतः उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है। ये सभी अर्थात् बुद्धि, मन तथा इन्हीं में अन्तर्भूत हुई चित्त एवं अहंकार नामक अन्तःकरण की सभी वृत्तियाँ सूक्ष्म आकाश आदि में स्थित सात्त्विक अंशों के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होते हैं। वस्तुतः मन एवं बुद्धि के सहयोग के अभाव में ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण नहीं कर पाती हैं। इसीकारण यहाँ उन्हें पञ्चसूक्ष्मभूतों के मिश्रित अंशों से उत्पन्न बताया गया है। पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, बुद्धि एवं मन ये सात अपञ्चीकृत पञ्चभूतों के सात्त्विक अंशों से उत्पन्न इसलिए माने गए हैं, क्योंकि ये सभी पदार्थों को प्रकाशित करने की क्षमता वाले हैं तथा शास्त्रों में सत्त्वगुण को प्रकाशक माना गया है—गीता का इस विषय में कहना है—"तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्।" कारण के गुण ही कार्य में भी विद्यमान रहते हैं। इसी सिद्धान्त की दृष्टि से उक्त सात की उत्पत्ति आकाशादि के सात्त्विक अंशों से मानी गयी है। पञ्चज्ञानेन्द्रियों सहित बुद्धि 'विज्ञानमयकोश' कहलाती है। इसी कोश से युक्त चैतन्य अपने आपको काम का करने वाला, भोगों को भोगने वाला, सुख एवं दुःख का अनुभव करने वाला मानता है। इसीकारण उसे स्वर्गलोक एवं मृत्युलोक आदि में आवागमन करना पड़ता है। व्यावहारिक अवस्था में इसी विज्ञानमयकोश से युक्त चैतन्य को 'जीव' भी कहा जाता है। इस प्रसंग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि चिदात्मा वस्तुतः कर्ता, भोक्ता आदि न होने पर भी विज्ञानमयकोश में अभिमानभाव के कारण ही लोक-परलोक में गमनागमनरूप व्यवहार का हेतु बन जाता है।
१८८ वेदान्तसार इसी भाव के कारण व्यावहारिकदृष्टि से वह 'जीव' इस संज्ञा को प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त पञ्चज्ञानेन्द्रियों के साथ मन के मिलने पर 'मनोमय कोश' का निर्माण होता है। आत्मा को ढकने वाला होने के कारण (आच्छादक) ही इन्हें 'कोशसंज्ञा' प्रदान की गई है। इन मनोमय एवं विज्ञानमय 'कोशों की कार्यसम्पादन की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। सामान्यतया विषय ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सर्वप्रथम मन के पास पहुँचता है। संकल्प-विकल्प करने के बाद वह उसे बुद्धि को सौंप देता है। तत्पश्चात् ही बुद्धि उसके विषय में निश्चयात्मक निर्णय लेती है। विशेष-(1) सांख्यदर्शन में भी सूक्ष्मशरीर को मान्यता प्रदान की गई है, किन्तु वहाँ इसके अट्ठारह अवयवों का उल्लेख किया गया है।^1 वहाँ उन्होंने अहंकार का अधिक कथन किया है। (2) सूक्ष्मशरीर को ही लिङ्गशरीर भी कहा गया है। इसका कारण इसके द्वारा प्रत्यगात्मा की सत्ता का ज्ञापन माना गया है-लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भावः एभिरिति लिङ्गानि, लिङ्गानि च तानि शरीराणि इति लिङ्गशरीराणि। (3) शतपथब्राह्मण ने भी 'सप्तदशः प्रजापति' कहकर सूक्ष्मशरीर के सत्रह अवयवों को ही मान्यता प्रदान की है। (4) पञ्चदशीकार ने भी सूक्ष्मशरीर को सत्रह अवयवों से युक्त बताया है- बुद्धिः कर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते।। (5) सांख्य के समान वेदान्त आकाशादि पञ्चसूक्ष्मभूतों की उत्पत्ति एक साथ नहीं मानता है, अपितु यहाँ आकाश से उत्तरोत्तर सूक्ष्मभूतों की उत्पत्ति को मान्यता प्रदान की गई है। जो अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक प्रतीत होती है। (6) मन और बुद्धि को अन्तः इन्द्रिय होने के कारण अन्तःकरण कहा गया है। करण शब्द का प्रयोग 'साधकतमं करणम्' परिभाषा के अनुसार इसके महत्त्व को प्रदर्शित करता है।
- द्रष्टव्य लेखककृत-सांख्यकारिका-संस्कृतग्रन्थागार, दिल्ली से प्रकाशित।
सूक्ष्मशरीर निरूपण १८९ (7) कुछ विद्वानों ने इसी प्रसङ्ग में चित्त और अहंकार को भी परिभाषित किया है- (क) अनुसंधानात्मिकान्तःकरणवृत्तिः चित्तम्। (ख) अभिमानात्मिकान्तःकरण वृत्तिरहंकारः॥ (8) विज्ञानमयकोश को ही व्यावहारिकदृष्टि से 'जीव' संज्ञा प्रदान की गई है। (9) प्रस्तुत अंश की चित्रात्मक व्याख्या के लिए द्रष्टव्य भूमिका में चित्रसंख्या-2, 3, 6 । अवतरणिका- इसी विषय को आगे विवेचन करते हुए पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण एवं प्राणमयकोश की उत्पत्ति की प्रक्रिया को कहते हैं- कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि। एतानि पुनराकाशादीनां रजोंशेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते। वायवः प्राणापानव्यानोदानसमानाः। प्राणो नाम प्राग्गमनवान्नासाग्रस्थानवर्ती। अपानो नामावाग्गमनवान्पाय्वादिस्थानवर्ती। व्यानो नाम विष्वग्गमनवानखिलशरीरवर्ती। उदानो नाम कण्ठस्थानीय ऊर्ध्वगमनवानुत्क्रमणवायुः। समानो नाम शरीरमध्यगताशित- पीतान्नादिसमीकरणकरः। केचित्तु नागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जयाख्याः पञ्चान्ये वायवः सन्तीति वदन्ति। तत्र नाग उद्गिरणकरः। कूर्म उन्मीलनकरः। कृकलः क्षुत्करः। देवदत्तो जृम्भणकरः। धनञ्जयः पोषणकरः। एतेषां प्राणादिष्वन्तर्भावात्प्राणादयः पञ्चैवेति केचित्। एतत्प्राणादिपञ्चक- माकाशादिगतरजोंशेभ्यो मिलितेभ्य उत्पद्यते। इदं प्राणादिपञ्चकं कर्मेन्द्रियैः सहितं सत्प्राणमयकोशो भवति। अस्य क्रियात्मकत्वेन रजोंशकार्यत्वम्। पदच्छेद-कर्मेन्द्रियाणि-वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ-आख्यानि। एतानि पुनः आकाश-आदीनाम् रजः अंशेभ्यः व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेण उत्पद्यन्ते। वायवः-प्राण-अपान-व्यान-उदान-समानाः। प्राणः नाम प्राग् गमनवान् नासाग्रस्थानवर्ती। अपानः नाम अवाक् गमनवान् पायु- आदि स्थानवर्ती। व्यानः नाम विष्वग् गमनवान् अखिल-शरीरवर्ती। उदानः नाम कण्ठस्थानीयः ऊर्ध्वगमनवान् उत्क्रमणवायुः। समानः नाम शरीरमध्यगत-अशीत-पीत-अन्नादि समीकरणकरः।
१९० वेदान्तसार केचित् तु नाग-कूर्म-कृकल-देवदत्त-धनञ्जय-आख्याः, पञ्च अन्ये वायवः सन्ति, इति वदन्ति। तत्र नागः उद्गरणकरः। कूर्मः उन्मीलनकरः। कृकलः क्षुत्करः। देवदत्तः जृम्भणकरः। धनञ्जय पोषणकरः। एतेषाम् प्राणादिषु अन्तर्भावात् प्राणादयः पञ्च एव इति केचित्। एतत् प्राणादिपञ्चकम् आकाशादिगत-रजोंशेभ्यः मिलितेभ्यः उत्पद्यते। इदम् प्राणादिपञ्चकम् कर्मेन्द्रियैः सहितम् सत् प्राणमयकोशः भवति। अस्य क्रियात्मकत्वेन रजोंश-कार्यत्वम्। अनुवाद- वाणी, हाथ, पैर, पायु और उपस्थ नामक (पाँच) कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये सभी वस्तुतः आकाश आदि के रजोगुणविषयक अंशों से क्रमशः अलग-अलग उत्पन्न होती हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान (ये पाँच) वायु हैं। (इनमें) नासिका के अग्रभाग पर रहने वाली, सामने की ओर गमन करने वाली 'प्राण' नामक वायु है। गुदा आदि स्थानों पर रहने वाली, नीचे की ओर गमन करने वाली 'अपान' नामक वायु है। सम्पूर्ण शरीर में निवास करने वाली तथा सब ओर गमन करने वाली 'व्यान' नामक वायु है। ऊपर की ओर गमन करने वाली कण्ठ स्थान में रहने वाली 'उदान' नामक उत्क्रमण (प्राणों को निकालने वाली) वायु है। शरीर के मध्यभाग में स्थित, खाए पीये अन्न आदि को भलीप्रकार पचाने वाली 'समान' नामक वायु है। (सांख्यमतावलम्बी) कुछ विद्वान् तो नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनञ्जय नामक पाँच अन्य वायु (भी) हैं, ऐसा कहते हैं। उनमें वमन (अथवा छींक) आदि कराने वाली 'नाग', नेत्रों को झपकाने वाली 'कूर्म', भूख उत्पन्न करने वाली 'कृकल', जम्भाई उत्पन्न करने वाली 'देवदत्त' तथा शरीर का पोषण करने वाली (वायु) 'धनञ्जय' है। इन (नाग आदि पञ्च वायुओं) का प्राण आदि पञ्चवायुओं में अन्तर्भाव हो जाने से कुछ (वेदान्ती) विद्वान् प्राण आदि पाँच ही वायु हैं, ऐसा (कहते हैं।) यह प्राण आदि पञ्चवायुओं का समूह आकाश आदि में स्थित रजोगुणमिश्रित अंशों से उत्पन्न होता है। (पञ्च) कर्मेन्द्रियों के साथ प्राणादि पञ्चवायुओं का यह समूह मिलकर प्राणमयकोश होता है। क्रियात्मक होने से ही इसका रजोगुण द्वारा निर्मित होना (सिद्ध होता है)।
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९१ 'चन्द्रिका' - पञ्चज्ञानेन्द्रिय बुद्धि और मन तथा इनसे निर्मित विज्ञानमय एवं मनोमयकोशों की उत्पत्ति का कथन करने के उपरान्त प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार प्राणमयकोश की सृष्टि को कहते हैं। प्राणमयकोश में आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से अलग-अलग उत्पन्न हुई वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामक पञ्चकर्मेन्द्रियाँ तथा उन्हीं आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होने वाली प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक पञ्चवायुओं का समूह होता है। प्राणमयकोश में क्रियाशीलता का प्राधान्य ही इसमें रजोगुण की प्रमुखता को प्रदर्शित करता है। इस आधार पर पञ्चकर्मेन्द्रिय एवं पञ्चप्राण इन दोनों की उत्पत्ति आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोगुण द्वारा मानी गयी है। इसका यही तात्पर्य है कि इनकी उत्पत्ति में यद्यपि सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण अपनी-अपनी भूमिका निर्वाह करते हैं, किन्तु प्रधानता इनमें रजोगुण की ही होती है, क्योंकि अन्य गुणों के सहयोग के अभाव में कोई भी अकेला गुण किसीप्रकार की सृष्टि करने में समर्थ नहीं होता है, न ही उसका अस्तित्व ही सम्भव है। पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति सूक्ष्म आकाश आदि के रजोगुण के अंश से क्रमशः अलग-अलग होती है। इसका अभिप्राय यही है कि सूक्ष्म आकाशगत रजोगुण से वाक् नामक कर्मेन्द्रिय, वायुगत रजोगुण से हस्त, अग्निगत रजोगुण से पाद, जलगत रजोगुण से पायु अर्थात् गुदाद्वार तथा पृथिवीगत रजोगुण से उपस्थ अर्थात् मूत्रेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है। इन सभी में कर्म की प्रधानता होने से इनका रजोगुणनिर्मित होना सिद्ध होता है। इनमें वाणी द्वारा बोलना, हाथों द्वारा आदान-प्रदान, पैरों द्वारा चलना, पायु द्वारा मलनिस्सारण तथा उपस्थ द्वारा मूत्रनिस्सारण, सन्तति उत्पन्न करना तथा आनन्द प्रदान करना रूप कार्य सम्पादित किए जाते हैं। तत्पश्चात् ग्रन्थकार प्राण, अपानादि पञ्चवायुओं के शरीर में स्थान तथा कार्य के विषय में कहते हैं-इनमें प्राण नामक वायु नासिका के अग्रभाग पर विद्यमान रहती है तथा शरीर में सामने की ओर चलती है। श्वास-प्रश्वास द्वारा हम इसका प्रतिदिन अनुभव करते हैं। अपानवायु शरीर में गुदा स्थान पर निवास करती है तथा इसकी गति नीचे की ओर होती है। शरीर के सभी अङ्गों में समानरूप 'से व्याप्त रहते हुए विचरण करने वाली वायु ही व्यान है। इसके द्वारा शरीर में रक्त संचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त
१९२ वेदान्तसार कण्ठस्थान में रहने वाली तथा प्राण निकलने के समय ऊपर की ओर गति करने वाली वायु को उदान कहते हैं। शरीर के अन्दर खाए हुए अन्नादि तथा पीये हुए जलादि को पचाने वाली वायु ही वस्तुतः 'समान' है, क्योंकि यह भक्ष्य एवं पेय पदार्थों का समानीकरण (पचाना) रूप कार्य सम्पादित करती है। पञ्चवायुओं के कथन के प्रसङ्ग में ही ग्रन्थकार सांख्यमत के अनुसार बतायी गयी नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय नामक अन्य पाँच वायुओं का उल्लेख, उनका कार्य बताते हुए 'केचित्' इत्यादि कहकर करते हैं। तदनुसार-छींक लाने वाली अथवा वमन कराने वाली वायु 'नाग' है। कूर्म नामक वायु पलकों को झपकाकर नेत्रों के मीलन एवं उन्मीलनरूप कार्य को करती है। कृकल नामक वायु क्षुधा को बढ़ाती है। इसके अतिरिक्त जम्भाईं लाने का कार्य देवदत्त नामक वायु द्वारा किया जाता है। जबकि धनञ्जय नामक वायु द्वारा शरीर को पुष्ट किया जाता है। किन्तु वेदान्तशास्त्री इन अतिरिक्त पाँच वायुओं का अन्तर्भाव पूर्वकथित वायुओं में ही इसप्रकार करके इन्हें अलग से मान्यता प्रदान नहीं करते हैं-उद्गिरण का कार्य उदान नामक वायु द्वारा ही सम्पादित करने से 'नाग' नामक वायु की पृथक् से मानने की आवश्यकता नहीं है। इसीप्रकार अंग विशेष के संकोच-विकोचरूपी उन्मीलन का कार्य व्यान द्वारा कर दिये जाने से 'कूर्म' की पृथक् मान्यता उचित नहीं है। अन्नादि का समीकरण करने वाली समान वायु में भूख को बढ़ाने वाली कृकल नामक वायु का अन्तर्भाव हो जाता है। इसीप्रकार जृम्भण आदि की कारणभूत देवदत्त नामक वायु का, विकृत वायु को निकालने की हेतुरूप अपान में एवं पोषण करने वाली धनञ्जय नामक वायु का 'समान' में सहज ही अन्तर्भाव हो जाने से इनको पृथक्रूप में मानना न्यायसंगत नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में 'प्राणमयकोश' का कथन किया गया है। (2) पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति उनमें क्रियाशीलता की प्रधानता के कारण सूक्ष्म आकाशादिभूतों के रजोंऽश से क्रमशः पृथक्-पृथक् बतायी गई है, जबकि पञ्चवायु को इन्हीं सूक्ष्मभूतों के मिश्रित रजोंऽशों से उत्पन्न बताया है, क्योंकि रजोगुण क्रियाशील माना गया है-उपष्टम्भं चलं च रजः (सांख्यकारिका)
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९३. (३) यहाँ प्रयुक्त प्रथम 'केचित्' पद सांख्यमतावलम्बी विद्वानों के लिए तथा द्वितीय 'केचित्' वेदान्तमतावलम्बी विद्वानों के लिए प्रयुक्त हुआ है। (४) प्राणमयकोश भी सूक्ष्मशरीर का एक अंग है। अतः यहाँ इसका विस्तृतवर्णन किया गया है। (५) प्रस्तुत प्रकरण को चित्रात्मकरूप में समझने के लिए द्रष्टव्य भूमिका में चित्रसंख्या चार, पाँच एवं छः। अवतरणिका-सूक्ष्मशरीर के कोषत्रय के बाह्यस्वरूप का कथन करके दैनिकव्यवहार में उनकी भूमिका का कथन करते हैं- एतेषु कोशेषु मध्ये विज्ञानमयो ज्ञानशक्तिमान् कर्तृरूपः। मनोमय इच्छाशक्तिमान् करणरूपः। प्राणमयः क्रियाशक्तिमान् कार्यरूपः। योग्यत्वादेवमेतेषां विभाग इति वर्णयन्ति। एतत्कोशत्रयं मिलितं सत्सूक्ष्मशरीरमित्युच्यते॥१३॥ पदच्छेद- एतेषु कोशेषु मध्ये विज्ञानमयः शक्तिमान् कर्तृरूपः। मनोमयः इच्छाशक्तिमान् करणरूपः। प्राणमयः क्रियाशक्तिमान् कार्यरूपः। योग्यत्वात् एवम् एतेषाम् विभागः इति वर्णयन्ति। एतत् कोषत्रयम् मिलितम् सत् सूक्ष्मशरीरम् इति उच्यते॥13॥ अनुवाद-इन (तीन) कोशों के बीच ज्ञानशक्ति से युक्त विज्ञानमयकोश कर्तारूप है। इच्छाशक्ति से युक्त मनोमयकोश करणरूप है। क्रियाशक्ति से युक्त प्राणमयकोश कार्यरूप है। इनकी योग्यता के आधार पर ही (विद्वान् लोग) इसप्रकार इनका विभागरूप में वर्णन करते हैं। ये तीनों कोश मिलकर ही 'सूक्ष्मशरीर' इसप्रकार कहे जाते हैं। 'चन्द्रिका'-यहाँ तक ग्रन्थकार ने सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर, जिसे लिङ्गशरीर भी कहते हैं, का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया। साथ ही बताया कि इसमें विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय कुल तीन कोश होते हैं। ये तीनों कोश ही वस्तुतः कर्ता, करण एवं क्रियारूप हैं, इस बात का प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रतिपादन करते हैं- विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीनों कोशों के अन्तर्गत प्रथम विज्ञानमयकोश, जिसका निर्माण पञ्चज्ञानेन्द्रिय तथा बुद्धि इन छः तत्त्वों द्वारा होता है, ज्ञानशक्ति से सम्पन्न होने के कारण दैनिक कार्यव्यवहार का कर्ता कहलाता है, क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विषयों को ग्रहण करके मन
१९४ वेदान्तसार के संकल्प-विकल्पात्मक सहयोग द्वारा बुद्धि ही वस्तु के विषय में 'ग्राह्य' अथवा 'त्याज्य' निर्णय करती है। इसके अतिरिक्त इसी विज्ञानमयकोश में ही चैतन्यतत्त्व के साथ अपेक्षाकृत अधिक निकटता होती है। अतः इसकी प्रधानता स्वतःसिद्ध है। बुद्धि का प्राधान्य होने से यह ज्ञानशक्तिसम्पन्न माना गया है। साथ ही प्रत्येक वस्तु के साथ भोक्ताभाव होने एवं कर्तृत्व का अभिमान होने के कारण यही कोश कर्ता कहा जाता है। श्रुतिवचन भी इसमें प्रमाण है- “योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिःपुरुषः” इसीप्रकार मनोमयकोश इच्छाशक्तिसम्पन्न होता है। विषय को बुद्धि के पास तक पहुँचाने में मन एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता हैं, क्योंकि बुद्धि एवं इन्द्रियों के कार्य करने पर भी मन के इधर-उधर होने अर्थात् उस विषय में सम्यक्रूप से उपस्थित न होने से बुद्धि, विषय को ग्रहण नहीं कर पाती है। 'मेरा मन अन्यत्र था, अतः मैंने नहीं सुना' इत्यादि अनुभव इस कथन की पुष्टि में प्रमाण है। इसलिए सिद्ध होता है कि ज्ञान के होने अथवा न होने में मन 'साधकतम' की भूमिका का निर्वाह करता है। इसीलिए उसे यहाँ करणरूप में प्रतिपादित किया गया है। प्राणमयकोश के अन्तर्गत पञ्चकर्मेन्द्रियाँ एवं पञ्चप्राण आते हैं। सूक्ष्म भूत आकाशादि के रजोंऽशों से इनका निर्माण होता है। गीता एवं सांख्यदर्शन ने रजोगुण को क्रियाशील माना है-‘रजः कर्मणि भारत’-गीता, 'उपष्टम्भकं चलं च रजः' (सांख्यकारिका)। रजोंऽश का कार्य होने के कारण प्राणमय कोश में क्रियाशीलता के दर्शन होते हैं। वाणीरूप कर्मेन्द्रिय बोलने का, हाथ आदान-प्रदान का, पैर चलने का तथा पायु एवं उपस्थ मलमूत्र के निस्सारण का कार्य करती हैं। ठीक इसीप्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में निवास करने वाले प्राण, आदि वायु भी शरीर को स्वस्थ रखते हुए उसे गतिशील बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसीलिए क्रियाशक्ति सम्पन्न होने से प्राणमयकोश को कार्यरूप बताया गया है। श्रुति का यह वचन भी इसके कार्यरूपत्व को सिद्ध करता है- “तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत” इसप्रकार विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों में अलग-अलग क्रमशः कर्ता, करण एवं क्रियारूप योग्यता होने के कारण ही
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९५ इनकी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ही इन्हें शास्त्रों में उक्त कर्ता आदि नामों के रूप में विभक्त किया गया है। अर्थात् उपर्युक्त विभाग एवं नामकरण का आधार मुख्यतया इन कोशों की अपनी योग्यता एवं क्षमता ही है। अन्य कुछ नहीं। अतः विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय ये तीनों कोश मिलकर ही 'सूक्ष्मशरीर' कहलाते हैं। विशेष- (1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में विज्ञानमयकोश को कर्ता, मनोमय को करण तथा प्राणमयकोश को क्रियारूप में प्रतिपादित किया गया है। (2) इनके इन कर्ता आदि के लिए उनकी योग्यता को ही आधार माना है। (3) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-४० सूक्ष्मशरीर बुद्धि+पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन+पञ्चज्ञानेन्द्रिय पञ्चकर्मेन्द्रिय+पञ्चप्राण विज्ञानमय कोश मनोमय कोश प्राणमय कोश शक्तिमान् इच्छाशक्तिमान् क्रियाशक्तिमान् कर्तृरूप करणरूप क्रियारूप अवतरणिका-तत्पश्चात् सम्पूर्ण चराचरजगत् के सूक्ष्मशरीरों में एकत्व की विवक्षा से समष्टिरूप एवं अलग-अलग कहने की दृष्टि से व्यष्टिरूप में क्रमशः जलाशय और जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान एकता का प्रतिपादन करते हैं- अत्राप्यखिलसूक्ष्मशरीरमेकबुद्धिविषयतया वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिरनेकबुद्धिविषयतया वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिरपि भवति। एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं सूत्रात्मा हिरण्यगर्भः प्राण श्चेत्युच्यते सर्वत्रानुस्यूतत्वाज्ज्ञानेच्छाक्रियाशक्तिमदुपहितत्वाच्च। अस्यैषा समष्टिः स्थूलप्रपञ्चापेक्षया सूक्ष्मत्वात्सूक्ष्मशरीरं विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासनामयत्वात्स्वप्नोऽत एव स्थूलप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते। एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं तैजसो भवति तेजोमयान्तःकरणोपहितत्वात्। अस्यापीयं व्यष्टिः स्थूलशरीरापेक्षया सूक्ष्मत्वादिति हेतोरेव सूक्ष्मशरीरं
१९६ वेदान्तसार विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासनामयत्वात्स्वप्नोऽत एव स्थूलशरीरलयस्थानमिति चोच्यते। एतौ सूत्रात्मतैजसौ तदानीं मनोवृत्तिभिः सूक्ष्मविषयाननुभवतः ‘प्रविविक्तभुक्तैजस’ इत्यादिश्रुतेः। अत्रापि समष्टिव्यष्ट्योस्तदुपहितसूत्रात्म- तैजसयोर्वनवृक्षवत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलवत्तद् तप्रतिबिम्बा- काशवच्चाभेदः। एवं सूक्ष्मशरीरोत्पत्तिः॥१४॥ पदच्छेद-अत्र अपि अखिलसूक्ष्मशरीरम् एकबुद्धिविषयतया वनवत् जलाशयवत् वा समष्टिः अनेकबुद्धि-विषयतया वृक्षवत् जलवत् वा व्यष्टिः अपि भवति। एतत् समष्टि उपहितम् चैतन्यम् सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भः प्राणः च इति उच्यते। सर्वत्र अनुस्यूतत्वात् ज्ञानेच्छा-क्रिया शक्तिमद् उपहितत्वात् च अस्य एषा समष्टिः स्थूलप्रपञ्च-अपेक्षया सूक्ष्मत्वात् सूक्ष्मशरीरम्, विज्ञानमयादि कोशत्रयम् जाग्रद् वासनामयत्वात् स्वप्नः, अत एव स्थूल-प्रपञ्चलयस्थानम् इति च उच्यते। एतद् व्यष्टि-उपहितम् चैतन्यम् तेजसः भवति, तेजोमय-अन्तःकरण-उपहितत्वात्। अस्य अपि इयम् व्यष्टिः स्थूलशरीर-अपेक्षया सूक्ष्मत्वाद् इति हेतोः एव सूक्ष्मशरीरम्, विज्ञानमयादि कोशत्रयम्, जाग्रद्वासनामयत्वात् स्वप्नः अतः एव स्थूलशरीर-लयस्थानम् इति च उच्यते। एतौ सूत्रात्मतेजसौ तदानीम् मनोवृत्तिभिः सूक्ष्मविषयान् अनुभवतः ‘प्रविविक्तभुक् तेजसः’ इत्यादि श्रुतेः। अत्र अपि समष्टि-व्यष्ट्योः तद् उपहित-सूत्रात्मतैजसयोः वनवृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत-प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च अभेदः। एवम् सूक्ष्मशरीरोत्पत्तिः।।14।। अनुवाद-यहाँ भी सम्पूर्ण चराचर के सूक्ष्मशरीर, एकत्व के ज्ञान का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि एवं अनेकत्व के ज्ञान का विषय होने से वृक्ष अथवा जल के समान व्यष्टि वाला भी होता है। इस समष्टि से उपहित चैतन्य सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण (क्रमशः) सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ और प्राण इसप्रकार कहा जाता है। इसकी यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण ‘सूक्ष्म-शरीर’, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, जाग्रत् अवस्था में
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९७ वासनायुक्त होने से 'स्वप्न', इसीलिए स्थूलप्रपञ्च का 'लयस्थान' भी कही जाती है। व्यष्टिरूप उपाधि से युक्त यह चैतन्य, तेजोयुक्त अन्तःकरण उपाधि से युक्त होने से 'तैजस्' होता है। इसकी भी यह व्यष्टि स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने रूपकारण से ही सूक्ष्मशरीर, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, एवं जाग्रत अवस्था में वासनायुक्त होने से स्वप्न, अतएव स्थूलशरीर का लयस्थान इस रूप में भी कहलाता है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों उससमय (भी) मनोवृत्तियों द्वारा सूक्ष्मविषयों का अनुभव करते हैं। "सूक्ष्मभोग करने वाला तैजस् है" इत्यादि श्रुति का वचन (इसमें प्रमाण है।) यहाँ भी समष्टिव्यष्टि एवं उनकी उपाधि से युक्त - सूत्रात्मा तथा तैजस् दोनों में वन और वृक्ष, उससे अवच्छिन्न आकाश के समान, जलाशय एवं जल तथा उसमें प्रतिबिम्बित आकाश के समान अभेद ही है। इसप्रकार सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति होती है। 'चन्द्रिका'-पूर्ववर्णित समष्टि एवं व्यष्टि के समान यहाँ भी सम्पूर्ण चराचरजगत् के अनन्तसंख्या वाले सूक्ष्मशरीरों को जब एक मानकर व्यवहार करते हैं, तो एकत्व की विवक्षा में वे सब एक बुद्धि का विषय होने के कारण वन अथवा जलाशय के समान 'समष्टि' इस रूप में व्यवहृत होते हैं तथा उनको ही जब हम अलग-अलग अनेक मानकर व्यवहार करते हैं तो अनेक जीवों के स्व-स्व बुद्धि का विषय होने के कारण ये वृक्ष अथवा जल के समान 'व्यष्टि' इस पद द्वारा व्यवहृत होते हैं। सूक्ष्मशरीरों की इस समष्टि से युक्त चैतन्यात्मा सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से युक्त होने के कारण क्रमशः सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ तथा प्राण कहा जाता है, क्योंकि विज्ञानमयकोश ज्ञान का, मनोमयकोश इच्छाशक्ति का तथा प्राणमयकोश क्रियाशक्ति का प्रतीक है। इन सबमें चैतन्यात्मा माला में सूत्र के समान विद्यमान रहता है, इसीलिए इसे सूत्रात्मा कहा जाता है। सूत्रात्मा एवं हिरण्यगर्भ की यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होती है। इसीलिए सूक्ष्मशरीर भी कहलाती है। इसके अतिरिक्त इस समष्टि में विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय तीन कोश होने से 'कोशत्रय' तथा विराट्रूप में अनुभव की गई स्थूलप्रपञ्च से सम्बन्धित वासना से युक्त होने के कारण 'स्वप्न' कहलाती है, क्योंकि चैतन्य स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत दैनिक व्यवहार में जिस-जिसप्रकार की अनुभूति करता है वे सभी भाव वासनारूप
१९८ वेदान्तसार में उसके अन्दर विद्यमान रहते हैं। उन्हीं भावों को वह स्वप्नावस्था में अनुभव करता है। इसके अलावा प्रलयकाल की अवस्था में सम्पूर्ण स्थूल प्रपञ्च का विलय भी इसी सूक्ष्मशरीर में होता है। इसलिए इसे 'लयस्थान' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट, अलग-अलग सूक्ष्मशरीर से उपलक्षित चैतन्य की 'तैजस्' संज्ञा होती है। समष्टि के समान ही यह भी स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण 'सूक्ष्मशरीर', विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों से युक्त होने से 'कोशत्रय' तथा चैतन्य द्वारा अनुभव की गई स्थूलशरीर सम्बन्धित वासनाओं से युक्त होने से 'स्वप्न' तथा स्थूलशरीर का लय होने से 'लयस्थान' कहलाती है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों सूक्ष्ममनोवृत्तियों द्वारा स्थूलशरीर में अनुभव किए गए वासनामय शब्दादि विषयों का स्वप्नावस्था में भी ठीक उसीप्रकार अनुभव करते हैं, जिसप्रकार ईश्वर और प्राज्ञ अज्ञान की सूक्ष्मवृत्तियों द्वारा सुषुप्ति अवस्था में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसका पूर्णवाक्य इसप्रकार है- 'स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसः' अर्थात् बाह्यविषयों से असम्बद्ध 'तैजस्' संज्ञा वाला चैतन्य स्वप्नावस्था में भी अपने सात अंगों एवं उन्नीस मुखों से वासनामय सूक्ष्मशब्द आदि विषयों का उपभोग करता है। यहाँ उन्नीस मुखों से अभिप्राय पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कुल उन्नीस तत्त्वों से है तथा सात अंग-अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु, वेद, दिशा, आकाश तथा पृथिवी को माना गया है। इसप्रकार यहाँ भी विज्ञानमय आदि कोशत्रय की समष्टि तथा उससे उपहित सूत्रात्मारूप चैतन्य की तथा इसी की व्यष्टिरूप विज्ञानमय आदि कोशत्रय तथा उससे अवच्छिन्न तैजस् संज्ञा वाले चैतन्य की, ठीक उसीप्रकार अभिन्नता मानी गयी है, जैसे-वन एवं वृक्ष तथा उनसे अवच्छिन्न आकाश में अभिन्नता होती है। इसीप्रकार जैसे-जल एवं जलाशय तथा उनमें प्रतिबिम्बित आकाश में ऐक्य है। अतः सूत्रात्मा एवं तैजस् इन दोनों का भेद समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से नाममात्र का भेद है। वास्तविकदृष्टि से समष्टि एवं व्यष्टि तथा उनमें स्थित सूत्रात्मा एवं तैजसरूप चैतन्य वस्तुतः एक ही हैं। इसप्रकार
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९९ अपञ्चीकृत पञ्चभूतों की सृष्टि 'सूक्ष्मशरीर' का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से भी विवेचन किया गया एवं उनकी परस्पर एकता भी प्रदर्शित की गई। विशेष-(1) स्वप्न-जाग्रत अवस्था में सांसारिकविषयों का अनुभव करने के परिणामस्वरूप बनी वासनाएँ ही चित्त में विद्यमान रहती हैं, जो स्वप्न में अनुभव की जाती हैं। इसप्रकार स्वप्न केवल वासनामय ही होता है। सूक्ष्मशरीर को भी जाग्रत अवस्था में विषयों के अनुभवरूप वासनाओं से उत्पन्न होने से 'स्वप्न' माना गया है। (2) समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' तथा व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' कहा गया है, जिसमें वन एवं वृक्ष के समान ऐक्य बताया गया है। (3) सम्पूर्ण चराचर के अनन्त सूक्ष्मशरीरों में माला के सूत्र के समान विद्यमान होने से समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' कहा गया है। (4) इसीप्रकार तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट होने के कारण पृथक्-पृथक् सूक्ष्मशरीरों में स्थित व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' संज्ञा प्रदान की गई है। (5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रस्तुत कर सकते हैं- सूक्ष्मशरीर ┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐ समष्टि व्यष्टि │ │ एक ही ज्ञान का विषय तवच्छिन्न अनेक उपलब्धियों का विषय ↗ ↖ जलाशय आकाश जल ↓ चैतन्य वन ───► वत् ◄─── वृक्ष चैतन्य │ ↓ │ सूत्रात्मा अभेद तैजस् हिरण्यगर्भ प्राण │ │ │ │ (माला में सूत्र के ──► प्राण ज्ञान इच्छा क्रिया समान स्थित होने से) हिरण्यगर्भ │ │ │ │ │ (तेजोमय विशिष्ट │ │ ज्ञान इच्छा क्रिया◄── अन्तःकरण सम्पन्न) │ │ │ │ │ └───────┬───────┘ └─────┬───────┘ शक्ति सम्पन्न होने से शक्ति सम्पन्न होने से ───► सूक्ष्मशरीर कोशत्रय स्वप्न लयस्थान अवतरणिका-सूक्ष्मशरीर एवं उसकी समष्टिव्यष्टि के ऐक्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार स्थूलसृष्टि के लिए आवश्यक पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख करते हैं-
२०० वेदान्तसार स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि। पञ्चीकरणं त्वाकाशादिपञ्चस्वेकैकं द्विधा समं विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान्पञ्चभागान्प्रत्येकं चतुर्धा समं विभज्य तेषां चतुर्णां भागानां स्वस्वद्वितीयार्धभागपरित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनम्। तदुक्तम्- “द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्वस्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात्पञ्चपञ्च ते” इति॥ पदच्छेद- स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि। पञ्चीकरणम् तु-आकाशादि पञ्चसु एकैकम् द्विधा समम् विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान् पञ्चभागान् प्रत्येकम् चतुर्धा समम् विभज्य, तेषाम् चतुर्णाम् भागानाम् स्व-स्वद्वितीय-अर्धभाग-परित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनम्। तद् उक्तम्- अन्वय- “प्रथमम् (प्रत्येकम्) द्विधा विधाय, पुनः एक-एकम् चतुर्धा (विधाय) स्व-स्व-इतर द्वितीयांशैः योजनात् ते पञ्च-पञ्च एव भवन्ति।” अनुवाद-पञ्चीकृत (महाभूतों) को ही स्थूलभूत (कहा जाता है)। पञ्चीकरण तो (वह है जिसमें) आकाश आदि सूक्ष्मपञ्चभूतों में से प्रत्येक को दो भागों में बराबर विभाजित करके, उन दस भागों के, प्रथम पञ्च भागों में से प्रत्येक को पुनः चार बराबर भागों में विभाजित करके, उन चार भागों को अपने-अपने द्वितीय अर्धभाग को छोड़कर दूसरे भागों में मिलाया जाता है। इसीलिए कहा भी गया है- सर्वप्रथम (प्रत्येक सूक्ष्मभूत को) समान दो भागों में विभाजित करके, तत्पश्चात् (प्रथम पाँच में से) प्रत्येक को चार भागों में विभक्त करके, अपने-अपने अंश को छोड़कर, अन्य भूतों के अर्धांश के साथ जोड़ने से वे पाँच (सूक्ष्मभूत) पाँच (स्थूलभूत) हो जाते हैं। 'चन्द्रिका'-यहाँ तक ग्रन्थकार ने अपञ्चीकृतसूक्ष्मभूतों से सूक्ष्मप्रपञ्च की उत्पत्ति का विस्तारपूर्वक कथन किया। तदनन्तर स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति के प्रतिपादन का उपक्रम करते हैं, किन्तु इससे पूर्व वेदान्त के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त पञ्चीकरण की प्रक्रिया को कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण स्थूल प्रपञ्च की उत्पत्ति पञ्चीकृतमहाभूतों द्वारा ही होती है। तदनुसार- पञ्चीकरण प्रक्रिया-आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के सर्वप्रथम दो-दो भाग किए जाते हैं। इसप्रकार प्राप्त हुए दस भागों में से प्रथम पाँच भागों को पुनः चार-चार भागों में विभाजित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप एक
पञ्चीकरण प्रक्रिया
पञ्चीकरण प्रक्रिया २०१ सूक्ष्मभूत अपने पाँच भागों में विभक्त हो जाता है-प्रथम 1/2+1/8+1/8+ 1/8+1/8=एक (एक आधा भाग तथा शेष चार 1/8 भाग)। पुनः इन सब भागों में से अपने-अपने आधे भाग को छोड़कर अन्य सूक्ष्मभूत का एक-एक अष्टमांश 1/8 भाग दूसरे चारों भागों में मिला दिया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक महाभूत में आधा अपना तथा शेष चार सूक्ष्मभूतों का 1/8 अष्टमांश मिलने पर प्रत्येक आकाश आदि भूत पूर्णता को प्राप्त करके, पञ्चीकृतमहाभूत की संज्ञा को प्राप्त कर लेता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-४१ पञ्चीकरण प्रक्रिया | | आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी | | | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | | 1/8 | वायु | आकाश | आकाश | आकाश | आकाश | | 1/8 | अग्नि | अग्नि | वायु | वायु | वायु | | 1/8 | जल | जल | जल | अग्नि | अग्नि | | 1/8 | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | जल | पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से स्थूलसृष्टि का निर्माण होता है। जिसका वर्णन आगे किया जाएगा। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को प्रमाणरूप में प्रयुक्त करते हैं। इस कारिका का अभिप्राय भी वही है जो ऊपर गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है। विशेष-(1) उपर्युक्त प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक विस्तारपूर्वक चित्रात्मक ढंग से समझने के लिए द्रष्टव्य चित्र संख्या 9 एवं 10 (भूमिका)। (2) आचार्य सुरेश्वर ने इसी पञ्चीकरणप्रक्रिया को अपने वार्तिक में इसप्रकार प्रतिपादित किया है, जो अपेक्षाकृत अधिक सरल प्रतीत होता है- पृथिव्यादीनि भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा। एकैकं भागमादाय चतुर्धा विभजेत् पुनः॥ एकैकं भागमेकस्मिन् भूते संवेशयेत्क्रमात्। ततश्चाकाशभूतस्य भागाः पञ्च भवन्ति हि॥