भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 314 में से

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सूक्ष्मशरीर निरूपण १९१ 'चन्द्रिका' - पञ्चज्ञानेन्द्रिय बुद्धि और मन तथा इनसे निर्मित विज्ञानमय एवं मनोमयकोशों की उत्पत्ति का कथन करने के उपरान्त प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार प्राणमयकोश की सृष्टि को कहते हैं। प्राणमयकोश में आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से अलग-अलग उत्पन्न हुई वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामक पञ्चकर्मेन्द्रियाँ तथा उन्हीं आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होने वाली प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक पञ्चवायुओं का समूह होता है। प्राणमयकोश में क्रियाशीलता का प्राधान्य ही इसमें रजोगुण की प्रमुखता को प्रदर्शित करता है। इस आधार पर पञ्चकर्मेन्द्रिय एवं पञ्चप्राण इन दोनों की उत्पत्ति आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोगुण द्वारा मानी गयी है। इसका यही तात्पर्य है कि इनकी उत्पत्ति में यद्यपि सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण अपनी-अपनी भूमिका निर्वाह करते हैं, किन्तु प्रधानता इनमें रजोगुण की ही होती है, क्योंकि अन्य गुणों के सहयोग के अभाव में कोई भी अकेला गुण किसीप्रकार की सृष्टि करने में समर्थ नहीं होता है, न ही उसका अस्तित्व ही सम्भव है। पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति सूक्ष्म आकाश आदि के रजोगुण के अंश से क्रमशः अलग-अलग होती है। इसका अभिप्राय यही है कि सूक्ष्म आकाशगत रजोगुण से वाक् नामक कर्मेन्द्रिय, वायुगत रजोगुण से हस्त, अग्निगत रजोगुण से पाद, जलगत रजोगुण से पायु अर्थात् गुदाद्वार तथा पृथिवीगत रजोगुण से उपस्थ अर्थात् मूत्रेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है। इन सभी में कर्म की प्रधानता होने से इनका रजोगुणनिर्मित होना सिद्ध होता है। इनमें वाणी द्वारा बोलना, हाथों द्वारा आदान-प्रदान, पैरों द्वारा चलना, पायु द्वारा मलनिस्सारण तथा उपस्थ द्वारा मूत्रनिस्सारण, सन्तति उत्पन्न करना तथा आनन्द प्रदान करना रूप कार्य सम्पादित किए जाते हैं। तत्पश्चात् ग्रन्थकार प्राण, अपानादि पञ्चवायुओं के शरीर में स्थान तथा कार्य के विषय में कहते हैं-इनमें प्राण नामक वायु नासिका के अग्रभाग पर विद्यमान रहती है तथा शरीर में सामने की ओर चलती है। श्वास-प्रश्वास द्वारा हम इसका प्रतिदिन अनुभव करते हैं। अपानवायु शरीर में गुदा स्थान पर निवास करती है तथा इसकी गति नीचे की ओर होती है। शरीर के सभी अङ्गों में समानरूप 'से व्याप्त रहते हुए विचरण करने वाली वायु ही व्यान है। इसके द्वारा शरीर में रक्त संचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त

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