भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

१९० वेदान्तसार केचित् तु नाग-कूर्म-कृकल-देवदत्त-धनञ्जय-आख्याः, पञ्च अन्ये वायवः सन्ति, इति वदन्ति। तत्र नागः उद्‌गरणकरः। कूर्मः उन्मीलनकरः। कृकलः क्षुत्करः। देवदत्तः जृम्भणकरः। धनञ्जय पोषणकरः। एतेषाम् प्राणादिषु अन्तर्भावात् प्राणादयः पञ्च एव इति केचित्। एतत् प्राणादिपञ्चकम् आकाशादिगत-रजोंशेभ्यः मिलितेभ्यः उत्पद्यते। इदम् प्राणादिपञ्चकम् कर्मेन्द्रियैः सहितम् सत् प्राणमयकोशः भवति। अस्य क्रियात्मकत्वेन रजोंश-कार्यत्वम्। अनुवाद- वाणी, हाथ, पैर, पायु और उपस्थ नामक (पाँच) कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये सभी वस्तुतः आकाश आदि के रजोगुणविषयक अंशों से क्रमशः अलग-अलग उत्पन्न होती हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान (ये पाँच) वायु हैं। (इनमें) नासिका के अग्रभाग पर रहने वाली, सामने की ओर गमन करने वाली 'प्राण' नामक वायु है। गुदा आदि स्थानों पर रहने वाली, नीचे की ओर गमन करने वाली 'अपान' नामक वायु है। सम्पूर्ण शरीर में निवास करने वाली तथा सब ओर गमन करने वाली 'व्यान' नामक वायु है। ऊपर की ओर गमन करने वाली कण्ठ स्थान में रहने वाली 'उदान' नामक उत्क्रमण (प्राणों को निकालने वाली) वायु है। शरीर के मध्यभाग में स्थित, खाए पीये अन्न आदि को भलीप्रकार पचाने वाली 'समान' नामक वायु है। (सांख्यमतावलम्बी) कुछ विद्वान् तो नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनञ्जय नामक पाँच अन्य वायु (भी) हैं, ऐसा कहते हैं। उनमें वमन (अथवा छींक) आदि कराने वाली 'नाग', नेत्रों को झपकाने वाली 'कूर्म', भूख उत्पन्न करने वाली 'कृकल', जम्भाई उत्पन्न करने वाली 'देवदत्त' तथा शरीर का पोषण करने वाली (वायु) 'धनञ्जय' है। इन (नाग आदि पञ्च वायुओं) का प्राण आदि पञ्चवायुओं में अन्तर्भाव हो जाने से कुछ (वेदान्ती) विद्वान् प्राण आदि पाँच ही वायु हैं, ऐसा (कहते हैं।) यह प्राण आदि पञ्चवायुओं का समूह आकाश आदि में स्थित रजोगुणमिश्रित अंशों से उत्पन्न होता है। (पञ्च) कर्मेन्द्रियों के साथ प्राणादि पञ्चवायुओं का यह समूह मिलकर प्राणमयकोश होता है। क्रियात्मक होने से ही इसका रजोगुण द्वारा निर्मित होना (सिद्ध होता है)।