वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ वेदान्तसार (२) गद्यखण्ड के आरम्भ में उल्लिखित अज्ञान की विक्षेपशक्ति के साथ-साथ आवरणशक्ति का भी अध्याहार करना चाहिए, क्योंकि यही आवरण नामक शक्ति शुद्धचैतन्यरूप तत्त्व के वास्तविकरूप को आवृत करती है। (३) सृष्टिक्रम में यहाँ सर्वप्रथम सूक्ष्म आकाश की उत्पत्ति को मान्यता प्रदान की गई है। (४) अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों को इस अवस्था में स्थूल इन्द्रियों द्वारा देखा नहीं जा सकता है। (५) इस अवस्था में इन सूक्ष्मभूतों में रूप, रस, गन्धादि गुण सूक्ष्मरूप में एवं स्वतन्त्ररूप में विद्यमान रहते हैं। (६) प्रस्तुत अंश के भाव को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-३९ विक्षेपशक्तिसम्पन्न तमोगुणप्रधान
┌─────────────────┐ │ अज्ञान से उपहित │ └────────┬────────┘ │ ( चैतन्य ) │ सूक्ष्मशरीराणि ── आकाश │ │ ┌───────────────────────┐ │ ├───> │ जाड्याधिक्या दर्शनात् │ ──> ( तमः प्राधान्यम् ) │ │ └───────────────────────┘ │ │ ▲ ▲ ▲ │ वायु ──────┘ │ │ │ │ │ │ │ अग्नि ──────────┘ │ │ │ │ उत्पद्यन्ते │ जल ─────────────────┘ ▲ │ │ पृथिवी ──────┬───────────────┐ सूक्ष्म महाभूतानि ◄────┘ │ │ सूक्ष्मभूत तन्मात्र अपञ्चीकृत └───────────┼──────────┘ कथ्यते
अवतरणिका—आकाशादि सूक्ष्मपञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति के पश्चात् इनमें भी सत्त्वादिगुणों की प्रधानता से सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर की सृष्टि का कथन करते हैं-