वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्मशरीर निरूपण १९९ अपञ्चीकृत पञ्चभूतों की सृष्टि 'सूक्ष्मशरीर' का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से भी विवेचन किया गया एवं उनकी परस्पर एकता भी प्रदर्शित की गई। विशेष-(1) स्वप्न-जाग्रत अवस्था में सांसारिकविषयों का अनुभव करने के परिणामस्वरूप बनी वासनाएँ ही चित्त में विद्यमान रहती हैं, जो स्वप्न में अनुभव की जाती हैं। इसप्रकार स्वप्न केवल वासनामय ही होता है। सूक्ष्मशरीर को भी जाग्रत अवस्था में विषयों के अनुभवरूप वासनाओं से उत्पन्न होने से 'स्वप्न' माना गया है। (2) समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' तथा व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' कहा गया है, जिसमें वन एवं वृक्ष के समान ऐक्य बताया गया है। (3) सम्पूर्ण चराचर के अनन्त सूक्ष्मशरीरों में माला के सूत्र के समान विद्यमान होने से समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' कहा गया है। (4) इसीप्रकार तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट होने के कारण पृथक्-पृथक् सूक्ष्मशरीरों में स्थित व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' संज्ञा प्रदान की गई है। (5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रस्तुत कर सकते हैं- सूक्ष्मशरीर ┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐ समष्टि व्यष्टि │ │ एक ही ज्ञान का विषय तवच्छिन्न अनेक उपलब्धियों का विषय ↗ ↖ जलाशय आकाश जल ↓ चैतन्य वन ───► वत् ◄─── वृक्ष चैतन्य │ ↓ │ सूत्रात्मा अभेद तैजस् हिरण्यगर्भ प्राण │ │ │ │ (माला में सूत्र के ──► प्राण ज्ञान इच्छा क्रिया समान स्थित होने से) हिरण्यगर्भ │ │ │ │ │ (तेजोमय विशिष्ट │ │ ज्ञान इच्छा क्रिया◄── अन्तःकरण सम्पन्न) │ │ │ │ │ └───────┬───────┘ └─────┬───────┘ शक्ति सम्पन्न होने से शक्ति सम्पन्न होने से ───► सूक्ष्मशरीर कोशत्रय स्वप्न लयस्थान अवतरणिका-सूक्ष्मशरीर एवं उसकी समष्टिव्यष्टि के ऐक्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार स्थूलसृष्टि के लिए आवश्यक पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख करते हैं-