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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

स्थूलमहाप्रपञ्च

२१२ वेदान्तसार चित्र-४४ स्थूलशरीरों की ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ समष्टि व्यष्टि वैश्वानर (विराट्) ──> अभेद ── [अधिष्ठातृ देवता] ── अभेद ── विश्व (१) पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ ──┬─ श्रोत्र ── दिक् ── शब्द ──┐ ├─ त्वक् ── वायु ── स्पर्श ──┤ ├─ चक्षु ── सूर्य ── रूप ───┼─ ग्रहण करना ├─ रसना ── वरुण ── रस ───┤ └─ घ्राण ── अश्विन् ─ गन्ध ──┘ (२) पञ्चकर्मेन्द्रियाँ ──┬─ वाक् ─── अग्नि ─── बोलना ──────┐ ├─ पाणि ── इन्द्र ─── आदान-प्रदान ─┤ ├─ पाद ─── उपेन्द्र ─ चलना ──────┼─ क्रियाएँ सम्पादित करना ├─ पायु ─── यम ──── विसर्जन ────┤ └─ उपस्थ ── प्रजापति ─ आनन्द ─────┘ (३) अन्तरिन्द्रियाँ ───┬─ मन ──── चन्द्र ── संकल्प-विकल्प ─┐ ├─ बुद्धि ── ब्रह्मा ─ निश्चय ───────┤ ├─ अहङ्कार ─ शिव ─── गर्व ─────────┼─ करना └─ चित्त ── विष्णु ─ स्मरण ────────┘ अवतरणिका—इसप्रकार स्थूलप्रपञ्च का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के पश्चात् स्थूलमहाप्रपञ्च की समष्टिव्यष्टि एवं उनमें स्थित चैतन्य में ऐक्य प्रतिपादित करते हैं— एतेषां स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चानामपि समष्टिरेको महान्प्रपञ्चो भवति यथावान्तरवनानां समष्टिरेकं महद्वनं भवति यथा वावान्तरजलाशयानां समष्टिरेको महान् जलाशयः। एतदुपहितं वैश्वानरादीश्वरपर्यन्तं चैतन्यमप्यवान्तरवनावच्छिन्नाकाशवदवान्तरजलाशयगतप्रतिबिम्बाकाशव- च्चैकमेव। आभ्यां महाप्रपञ्चतदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं सदनुपहितं चैतन्यं “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इति वाक्यस्य वाच्यं भवति

स्थूलमहाप्रपञ्च २१३ विविक्तं सलक्ष्यमपि भवति। एवं वस्तुन्य वस्त्वारोपोऽध्यारोपः सामान्येन प्रदर्शितः ॥१८॥ पदच्छेद-एतेषाम् स्थूल-सूक्ष्मकारणप्रपञ्चानाम् अपि समष्टिः एकः महान् प्रपञ्चः भवति, यथा- अवान्तर वनानाम् समष्टिः एकम् महद्वनम् भवति। यथा वा अवान्तर-जलाशयानाम् समष्टिः एकः महान् जलाशयः। एतद् उपहितम् वैश्वानराद् ईश्वरपर्यन्तम् चैतन्यम् अपि अवान्तर वन-अवच्छिन्न-आकाशवद् अवान्तर जलाशयगत-प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च एकम् एव। आभ्याम् महाप्रपञ्च तद् उपहित-चैतन्याभ्याम् तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सद् अनुपहितम् चैतन्यम् “सर्वं खलु इदं ब्रह्म” इति वाक्यस्य वाच्यम् भवति, विविक्तम् सत् लक्ष्यम् अपि भवति। एवम् वस्तुनि अवस्तु-आरोपः अध्यारोपः सामान्येन प्रदर्शितः।।18।। अनुवाद-जिसप्रकार अलग-अलग वनों का समूह एक महान् वन हो जाता है अथवा जिसप्रकार पृथक्-पृथक् जलाशयों का समुदाय एक महान् जलाशय बन जाता है, (ठीक उसीप्रकार) इन स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण प्रपञ्चों की समष्टि भी एक महान्प्रपञ्च हो जाता है। इस उपाधि से उपहित वैश्वानर से लेकर ईश्वरपर्यन्त चैतन्य भी अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश के समान तथा भिन्न-भिन्न जलाशयों में प्रतिबिम्बित आकाश के समान एक ही होता है। ‘चन्द्रिका’-ग्रन्थकार ने यहाँ तक, कारणशरीर, समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से जिसमें स्थित चैतन्य ईश्वर एवं प्राज्ञ कहलाता है। सूक्ष्मशरीर, समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से जिसमें स्थित चैतन्य क्रमशः हिरण्यगर्भ अथवा सूत्रात्मा एवं तैजस् कहा जाता है। ठीक इसीप्रकार स्थूलशरीर, जिसमें स्थित चैतन्य समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से क्रमशः वैश्वानर (विराट्) एवं विश्व कहलाता है, का प्रतिपादन किया। जिसप्रकार आम, शीशम, पलाश आदि भिन्न-भिन्न वनों की समष्टि से एक विशालकाय महावन का निर्माण होता है तथा वापी, कूप, तालाब आदि अलग-अलग जलाशयों की समष्टि से एक विशाल महान् जलाशय बन जाता है। ठीक इसीप्रकार अभी तक बताए गए कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूल- शरीरों की समष्टि को मिलाकर एक महाप्रपञ्च का निर्माण होता है तथा जिसप्रकार वन से अवच्छिन्न आकाश एवं वृक्षों से अवच्छिन्न-आकाश में कोई भेद नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार इन तीनों प्रकार के प्रपञ्चों में स्थित चैतन्यों में अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश के समान, अलग-अलग जलाशयों

२१४ वेदान्तसार में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश के समान, तात्त्विकदृष्टि से किसी भी प्रकार की कोई भिन्नता नहीं होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश हमें स्थूलदृष्टि से देखने पर भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं तथा जिसप्रकार अलग-अलग जलाशयों में प्रतिबिम्बित आकाश भी हमें स्थूल- दृष्ट्या अलग-अलग ही प्रतीत होते हैं, किन्तु उनमें तात्त्विकदृष्टि से कोई भेद नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर की समष्टिव्यष्टि से उपहित चैतन्य भी स्थूलदृष्टि से ही क्रमशः ईश्वर प्राज्ञ, सूत्रात्मा, तैजस् एवं वैश्वानर, विश्वरूप में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, जबकि तात्त्विकदृष्टि से इनमें कोई भेद नहीं होता है। पुनः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' रूप महावाक्य के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को कहते हैं- इस महाप्रपञ्च तथा उससे उपहित चैतन्य से अभिन्न होकर परमशुद्ध चैतन्य 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' इस महावाक्य का वाच्यार्थ होता है तथा वही अलग-अलग होने की स्थिति में लक्ष्यार्थ भी होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार एक लोहे के गोले को अग्नि में डालने पर वह तपकर लाल हो जाता है तथा उससे जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' इसप्रकार कहा जाता है, जबकि जलाने की शक्ति लोहे में न होकर अग्नि में होती है। यहाँ अग्नि के सम्पर्क में आने पर लोहे और अग्नि का परस्पर तादात्म्य सम्बन्ध होने अर्थात् अत्यधिक नैकट्य होने से वे दोनों हमें एक प्रतीत होते हैं, जबकि होते वे दोनों अलग-अलग हैं। उसीप्रकार महाप्रपञ्च एवं उससे अवच्छिन्नचैतन्य के साथ परस्पर तादात्म्य की प्रतीति होने से प्रतीत होने वाला उपाधिशून्य शुद्धचैतन्य ही 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' महावाक्य का अभिधा शब्दशक्ति से प्रतीत होने वाला सीधा अर्थ अर्थात् वाच्यार्थ है। इसके अतिरिक्त उक्त महाप्रपञ्च एवं उससे उपहितचैतन्य के परस्पर आभासित होने वाली तादात्म्य की प्रतीति से शुद्ध चैतन्य को अलग मानने पर वही 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' रूप महावाक्य का लक्ष्यार्थ हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार 'अयो दहति' लोहा जलाता है, इत्यादि वाक्य में लोहे में जलाये जाने की क्षमता न होने से मुख्य अर्थ (वाच्यार्थ) का बाध हो जाता है तथा लक्षणा शब्दशक्ति से तत्सम्बद्ध अन्य अर्थ की प्रतीति-'लोहे में स्थित अग्नि जलाती है' इस रूप में होती है, जो

स्थूलमहाप्रपञ्च २१५ वस्तुतः उपर्युक्त 'अयो दहति' वाक्य का लक्ष्यार्थ माना जाएगा, क्योंकि यहाँ 'अय स्' शब्द की अयोगत अग्नि में लक्षणा की गयी है। ठीक इसीप्रकार 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' यह सब कुछ दृश्यमानजगत् ही ब्रह्म है। महावाक्य के इस वाच्यार्थ में महाप्रपञ्च, उससे उपहित चैतन्य एवं शुद्धचैतन्य ये तीनों एक कैसे हो सकते हैं? इस आशङ्का से मुख्य अर्थ का बाध होने से लक्षणा करनी होगी तथा उस स्थिति में विशेषणरूप अंश का परित्याग करके चैतन्यमात्र को ग्रहण करेंगे। ऐसा करने पर महाप्रपञ्च से उपहितचैतन्य एवं परमशुद्धचैतन्य दोनों एक हो जाएंगे। परिणामस्वरूप सर्वप्रपञ्च एवं चैतन्य की एकता स्वतःसिद्ध हो जाएगी। इसप्रकार यहाँ तक वस्तु में अवस्तु के आरोपरूप अध्यारोप का सामान्यरूप से वर्णन किया गया। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में सृष्टिविकास के कारण, सूक्ष्म एवं स्थूलशरीररूप विकास की अवस्थाओं में प्रतीत होने वाले भेदों में चैतन्य की दृष्टि से अभेद की स्थापना की गई है। (3) महाप्रपञ्च का सोदाहरण निरुपण किया गया है। (4) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-४५ महाप्रपञ्च महावन महासरोवर आम्रवन समष्टि वापी पलाशवन तडाग खदिरवन सरोवर कारणशरीर सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर समष्टि व्यष्टि समष्टि व्यष्टि समष्टि व्यष्टि ईश्वर प्राज्ञ हिरण्यगर्भ तेजस् वैश्वानर विश्व अभिन्नता चैतन्य का ऐक्य भिन्नता चैतन्य से प्रपञ्च की सर्वं खल्विदं ब्रह्म प्रपञ्च+चैतन्य-भिन्नता अभिन्नता लोह एवं अग्नि की अयोहति लोह+अग्नि-भिन्नता अभिन्नता लोहे से जल गया अग्नि लोहे में स्थित अग्नि से जल गया वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ

चार्वाकादिमत निराकरण

२१६ वेदान्तसार अवतरणिका-इसप्रकार अज्ञान के कारण चैतन्य में प्रतिभासित होने वाले सम्पूर्ण जगत्प्रपञ्च के विकास की समष्टिव्यष्टिविषयक मान्यताओं एवं उनमें ऐक्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् आत्माविषयक अनेक प्रकार की भ्रान्तधारणाओं का निराकरण तथा श्रुति में उनके विषय में वर्णित औचित्य के विषय में कहते हैं- इदानीं प्रत्यगात्मनीदमिदमयमयमारोपयतीति विशेषत उच्यते। अतिप्राकृतस्तु “आत्मा वै जायते पुत्र” इत्यादिश्रुतेः स्वस्मिन्निव स्वपुत्रेऽपि प्रेमदर्शनात्पुत्रे पुष्टे नष्टे चाहमेव पुष्टो नष्टश्चेत्याद्यनुभवाच्च पुत्र आत्मेति वदति। चार्वाकस्तु “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमय” इत्यादिश्रुतेः प्रदीप्तगृहात्स्वपुत्रं परित्यज्यापि स्वस्य निर्गमदर्शनात्स्थूलोऽहं कृशोऽहमित्याद्यनुभवाच्च स्थूलशरीरमात्मेति वदति। अपरश्चार्वाकः “ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्य ब्रूयुः” इत्यादिश्रुतेरिन्द्रियाणामभावे शरीरचलनाभावात्काणोऽहं बधिरोऽहमित्याद्यनुभवाच्चेन्द्रियाण्यात्मेति वदति। अपरश्चार्वाकः “अन्योऽन्तर आत्माप्राणमय” इत्यादिश्रुतेः प्राणाभाव इन्द्रियादिचलनायोगादहमशनायावानहं पिपासावानित्याद्यनुभवाच्च प्राण आत्मेति वदति। अन्यस्तु चार्वाकः “अन्योऽन्तर आत्मा मनोमय” इत्यादिश्रुतेर्मनसि सुप्ते प्राणादेरभावादहं सङ्कल्पवानहं विकल्पवानित्याद्यनुभवाच्च मन आत्मेति वदति। बौद्धस्तु “अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमय” इत्यादिश्रुतेः कर्तुरभावे करणस्य शक्त्यभावादहं कर्ताहं भोक्तेत्याद्यनुभवाच्च बुद्धिरात्मेति वदति। प्राभाकरतार्किकौ तु “अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय” इत्यादिश्रुते- र्बुद्ध्यादीनामज्ञाने लयदर्शनदहमज्ञोऽहमज्ञानीत्याद्यनुभवाच्चाज्ञानमात्मेति वदतः। भाट्टस्तु “प्रज्ञानघन एवानन्दमय” इत्यादिश्रुतेः सुषुप्तौ प्रकाशाप्रकाशसद्भावान्मामहं न जानामीत्याद्यनुभवाच्चाज्ञानोपहितं चैतन्यमात्मेति वदति। अपरो बौद्धः “असदेवेदमग्र आसीत्” इत्यादिश्रुतेः सुषुप्तौ सर्वाभावादहं सुषुप्तौ नासमित्युत्थितस्य स्वाभावपरामर्शविषयानुभवाच्च शून्यमात्मेति वदति॥१९॥

चार्वाकादिमत-निराकरण २१७

पदच्छेद- इदानीम् प्रत्यग् आत्मनि इदम्-इदम्, अयम्-अयम् आरोपयंति, इति विशेषतः उच्यते- (1) अतिप्राकृतः तु-“आत्मा वै जायते पुत्रः” इत्यादि श्रुतेः, स्वस्मिन् इव स्वपुत्रे अपि प्रेमदर्शनात् पुत्रे पुष्टे नष्टे च अहम् एव पुष्टः नष्टः च इत्यादि अनुभवात् च पुत्रः आत्मा इति वदति। (2) चार्वाकः तु-“सः वै एष पुरुषः अन्नरसमयः” इत्यादि श्रुतेः। प्रदीप्तगृहात् स्वपुत्रम् परित्यज्य अपि स्वस्य निर्गमदर्शनात्, स्थूलः अहम्, कृशः अहम् इत्यादि अनुभवात् च स्थूलशरीरम् आत्मा, इति वदति। (3) अपरः चार्वाकः “ते ह प्राणाः प्रजापतिम् पितरम् एत्य ब्रूयुः” इत्यादि श्रुतेः, इन्द्रियाणाम् अभावे शरीरचलनाभावात्, काणः अहम्, बधिरः अहम्, इत्यादि अनुभवात् च इन्द्रियाणि आत्मा, इति वदति। (4) अपरः चार्वाकः “अन्यः अन्तरः आत्मा प्राणमयः” इत्यादि श्रुतेः, प्राण-अभावे इन्द्रियादि-चलन-अयोगाद्, अहम् अशनायावान्, अहम् पिपासावान् इत्यादि अनुभवात् च प्राणाः आत्मा इति वदति। (5) अन्यः तु चार्वाकः “अन्यः अन्तरः आत्मा मनोमयः” इत्यादि श्रुतेः, मनसि सुप्ते प्राणादेः अभावाद् अहम् सङ्कल्पवान्, अहम् विकल्पवान् इत्यादि अनुभवात् च मनः आत्मा इति वदति। (6) बौद्धः तु “अन्यः अन्तर आत्मा विज्ञानमयः” इत्यादि श्रुतेः, कर्तुः अभावे करणस्य शक्ति-अभावात्, अहम् कर्ता, अहम् भोक्ता, इत्यादि अनुभवात् च बुद्धिः आत्मा इति वदति। (7) प्राभाकरतार्किकौ तु “अन्यः अन्तरः आत्मा आनन्दमयः” इत्यादि श्रुतेः बुद्धि-आदीनाम् अज्ञाने लयदर्शनात् अहम् अज्ञः, अहम् अज्ञानी, इत्यादि अनुभवात् च अज्ञानम् आत्मा इति वदतः। (8) भाट्टः तु “प्रज्ञानघन एव आनन्दमयः” इत्यादि श्रुतेः, सुषुप्तौ प्रकाश-अप्रकाश-सद्भावात् माम् अहम् न जानामि, इत्यादि अनुभवात् च अज्ञान-उपहितम् चैतन्यम् आत्मा, इति वदति। (9) अपरः बौद्धः “असद् एव इदम् अग्रे आसीत्” इत्यादि श्रुतेः, सुषुप्तौ सर्व-अभावाद् ‘अहम् सुषुप्तौः न आसम्’ इति उत्थितस्य स्व-अभावपरामर्श-विषय-अनुभवात् च शून्यम् आत्मा इति वदति।।19।।

२१८ वेदान्तसार अनुवाद- अब अन्तरात्मारूप चैतन्य में 'यह आत्मा है', 'यह आत्मा है', इसप्रकार जो आरोप किया जाता है, विशेषरूप से (उसके विषय में) कहा जा रहा है- (1) अत्यन्त सामान्यलोग तो 'आत्मा ही पुत्ररूप में उत्पन्न होता है', इत्यादि श्रुति के वचन से एवं अपने समान ही अपने पुत्र में भी प्रेम को देखने के कारण, पुत्र के पुष्ट एवं नष्ट होने पर 'मैं ही पुष्ट एवं नष्ट हो गया' इत्यादि अनुभव के कारण 'पुत्र ही आत्मा है', इसप्रकार कहते हैं। (2) चार्वाक् (मतानुयायी) तो "वह यह पुरुष अन्नरस का विकार है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, जलते हुए घर में अपने पुत्र को भी छोड़कर स्वयं के (बाहर) निकल आने को देखकर, मैं मोटा हूँ, मैं पतला हूँ, इत्यादि अनुभव के कारण, (यह) स्थूलशरीर ही आत्मा है, इसप्रकार कहता है। (3) अन्य चार्वाक् (मतानुयायी) 'वे प्राण अर्थात् इन्द्रियाँ प्रजापति के पास जाकर बोलीं' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, इन्द्रियों के अभाव में शरीर में गति का अभाव होने से, 'मैं काना हूँ', 'मैं बहरा हूँ' इत्यादि अनुभवों के कारण, 'इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं', इसप्रकार कहता है। (4) अन्य चार्वाक् (मतानुयायी) 'आन्तरिक आत्मा (इससे) भिन्न अर्थात् प्राणरूप है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, प्राणों के अभाव में इन्द्रिय आदि में गति न होने से, 'मैं भूखा हूँ', 'मैं प्यासा हूँ' इत्यादि अनुभव के कारण, 'प्राण ही आत्मा है', ऐसा कहता है। (5) अन्य चार्वाक् (मतानुयायी) तो 'आन्तरिक आत्मा (इससे) भिन्न अर्थात् मनोमय है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, मन के प्रसुप्त होने पर प्राणादि का अभाव होने से, 'मैं सङ्कल्पवान् हूँ', 'मैं विकल्पवान् हूँ' इत्यादि अनुभव के कारण, 'मन ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है। (6) बौद्ध (मतानुयायी) तो 'आन्तरिक आत्मा (इससे) अलग अर्थात् विज्ञानमय है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, कर्ता के अभाव में करण की शक्ति का अभाव हो जाने के कारण, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ इत्यादि अनुभव से, 'बुद्धि ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है। (7) प्रभाकर अनुयायी एवं न्याय (मतावलम्बी) तो 'आन्तरिक आत्मा (इस सबसे) भिन्न अज्ञानमय है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, बुद्धि आदि

चार्वाकादिमत-निराकरण २९९ का अज्ञान में लय होता देखने से, 'मैं अज्ञानी हूँ', 'मैं अज्ञानी हूँ', इत्यादि अनुभव के कारण, 'अज्ञान ही आत्मा है' इसप्रकार कहते हैं। (8) कुमारिलभट्ट के (मतानुयायी) तो 'अज्ञानघन और आनन्दमय ही आत्मा है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, सुषुप्ति अवस्था में प्रकाश एवं अप्रकाश दोनों के विद्यमान होने से, 'मैं स्वयं को नहीं जानता हूँ', इत्यादि अनुभव के कारण, 'अज्ञानरूप उपाधि से युक्त चैतन्य ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है। (9) अन्य बौद्ध (मतानुयायी) - 'सृष्टि से पूर्व यह असत् (शून्य) ही था' इत्यादि श्रुति का वचन, सुषुप्ति अवस्था में सबका अभाव होने के कारण, 'मैं सुषुप्ति अवस्था में नहीं था' उठने पर ऐसे अपने अभावरूप परामर्शविषयक अनुभव होने के कारण, 'शून्य ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है। 'चन्द्रिका' - उक्त अंश की व्याख्या के लिए द्रष्टव्य भूमिका में शीर्षक (23) - आत्मा विषयक विभिन्न मत। पृष्ठ संख्या-(98)। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार के समय में आत्मा के सम्बन्ध में प्रचलितमतों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। (2) यहाँ आत्मा के सम्बन्ध में स्थूलतम से सूक्ष्म की ओर जाते हुए तत्तत् मत को श्रुति, तर्क एवं अनुभव के आधार पर पुष्ट करते हुए पूर्वपक्ष का प्रतिपादन किया गया है। (3) चार्वाक-नास्तिक विचारधारा के लोग, जो केवल भोगवाद में विश्वास करते थे। इनकी बातें सामान्यतया सुनने में अच्छी लगने के कारण सम्भवतः इन्हें 'चारु वाक्' कहा गया। (4) अपरः चार्वाकः शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनसमय में सम्भवतः चार्वाक मतावलम्बियों में भी भिन्न-भिन्न मत विद्यमान थे। (5) मतसंख्या तीन में 'प्राण' शब्द 'इन्द्रिय' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। (6) प्रकाशाप्रकाशसद्भावात्-सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों ही विद्यमान रहते हैं। यहाँ प्रकाश, ज्ञान का तथा अप्रकाश, अज्ञान का प्रतीक है। (7) प्रज्ञानघन से अभिप्राय अज्ञान की अपेक्षा ज्ञान के आधिक्य से है। (8) 'भाट्ट' शब्द का प्रयोग कुमारिलभट्ट के अनुयायी मीमांसकों के लिए प्रयुक्त हुआ है।

२२० वेदान्तसार (9) तार्किक से अभिप्राय न्यायसिद्धान्त के मतावलम्बी विद्वानों से है। (10) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-४६ आत्मा (1) पुत्र ───→ श्रुति ──→ आत्मा वै जायते पुत्रः (साधारण व्यक्ति) ── तर्क ──→ अपने समान ही पुत्र के प्रति प्रेम ── अनुभव──→ पुत्र के नष्ट होने पर 'मैं नष्ट हो गया' (2) शरीर ───→ श्रुति ──→ सः वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः (चार्वाक) ── तर्क ──→ आग में जलते पुत्र को छोड़कर स्वयं को बचाना ── अनुभव──→ मैं पतला हूँ, मैं मोटा हूँ (3) इन्द्रिय ───→ श्रुति ──→ ते ह प्राणा प्रजापतिः पितरमेत्य ब्रूयुः (चार्वाक) ── तर्क ──→ इन्द्रियों के बिना शरीर में गति का अभाव ── अनुभव──→ मैं काना हूँ, मैं बहरा हूँ (4) प्राण ───→ श्रुति ──→ अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः (चार्वाक) ── तर्क ──→ प्राणों के बिना इन्द्रियों में गति का अभाव ── अनुभव──→ मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ (5) मन ───→ तर्क ── अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः (श्रुति) (चार्वाक) ────── मन की अनुपस्थिति में इन्द्रियों द्वारा कार्य न ────────── कर पाना, मैं सङ्कल्पवान् हूँ। (अनुभव) (6) बुद्धि ───→ तर्क ── अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः (श्रुति) (बौद्ध) ────── कर्ता के अभाव में करण की शक्ति का ────────── अभाव, मैं कर्ता, मैं भोक्ता। (अनुभव) (7) अज्ञान ─── तर्क ── अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः (श्रुति) (मीमांसक, ────── बुद्धि आदि का भी अज्ञान में लय होता है। नैयायिक) ────── मैं अज्ञानी हूँ (अनुभव) (8) अज्ञानोपहितचैतन्य ──→ प्रज्ञानघन एवानन्दमयः (श्रुति) (भाट्ट मीमांसक) ── सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान अज्ञान दोनों की स्थिति ────────── का रहना। (तर्क) ────────── मैं स्वयं को नहीं जानता हूँ (अनुभव) (9) शून्य ───→ ── असदेवेदमग्र आसीत् (श्रुति) (बौद्ध) ────── सुषुप्ति अवस्था में सबका अभाव (तर्क) ────────── मैं सुषुप्ति अवस्था में नहीं था। (अनुभव)

चार्वाकादिमत-निराकरण २२१ अवतरणिका-इसप्रकार विभिन्नमतों में आत्माविषयक मतों का निरूपण पूर्वपक्ष के रूप में करने के पश्चात् 'पुत्रादि' का 'आत्मा न होना' प्रतिपादित करते हुए श्रुतियों के प्रामाण्य को सिद्ध भी करते हैं- एतेषां पुत्रादीनामनात्मत्वमुच्यते। एतैरतिप्राकृतादिवादिभिरुक्तेषु श्रुतियुक्त्यनुभवाभासेषु पूर्वपूर्वोक्तश्रुतियुक्त्यनुभवाभासानामुत्तरोत्तर- श्रुतियुक्त्यनुभवाभासैरात्मत्वबाधदर्शनात्पुत्रादीनामनात्मत्वं स्पष्टमेव। किञ्च प्रत्यगस्थूलोऽचक्षुरप्राणोऽमना अकर्ता चैतन्यं चिन्मात्रं सदित्यादिप्रबलश्रुतिविरोधादस्य पुत्रादिशून्यपर्यन्तस्य जडस्य चैतन्यभास्यत्वेन घटादिवदनित्यत्वादहं ब्रह्मेति विद्वदनुभवप्राबल्याच्च तत्तच्छ्रुतियुक्त्यनुभवाभासानां बाधितत्वादपि पुत्रादिशून्यपर्यन्त- मखिलमनात्मैव। अतस्तत्तद्भासकं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्यस्वभावं प्रत्यक्चैतन्यमेवात्मवस्त्विति वेदान्त विद्वदनुभवः। एवमध्यारोपः॥२०॥ पदच्छेद-एतेषाम् पुत्रादीनाम् अनात्मत्वम् उच्यते। एतैः अतिप्राकृत-वादिभिः उक्तेषु श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासेषु पूर्व-पूर्वोक्त श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासानाम् उत्तरोत्तर-श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासैः आत्मत्व-बाधदर्शनात् पुत्रादीनाम् अनात्मत्वम् स्पष्टम् एव। किञ्च प्रत्यग्-अस्थूलः अचक्षुः अप्राणः अमना अकर्ता चैतन्यम् चिन्मात्रम् सद् इत्यादि प्रबलश्रुति-विरोधाद् अस्य पुत्रादिशून्यपर्यन्तस्य जडस्य चैतन्य- भास्यत्वेन घटादिवद् अनित्यत्वाद् अहम् ब्रह्म इति, विद्वद्-अनुभवप्राबल्यात् च तत् तत् श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासानाम् बाधितत्वाद् अपि पुत्रादि- शून्यपर्यन्तम् अखिलम् अनात्मा एव। अतः तत् तद् भासकम् नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-सत्यस्वभावम् प्रत्यक् चैतन्यम् एव आत्मवस्तु, इति वेदान्त-विद्वद् अनुभवः। एवम् अध्यारोपः॥20॥ अनुवाद-(अब) इन पुत्र आदि का अनात्मत्व कहा जाता है। इन अत्यन्त साधारणलोगों आदि द्वारा कहे गए श्रुति, युक्ति एवं अनुभव आभासों में पूर्व-पूर्व में प्रतिपादित श्रुति-युक्ति और अनुभव आभासों का उत्तरोत्तर श्रुति-युक्ति और अनुभव आभासों द्वारा, पुत्र आदि के आत्मा के बाधरूप दर्शन से, उन (पुत्र-आदिकों) का आत्मा न होना स्पष्ट ही है। इसके अतिरिक्त 'आन्तरिक आत्मा सूक्ष्म, अचक्षु, अप्राण, अमना, अकर्ता, चैतन्यज्ञानस्वरूप एवं नित्य है' इत्यादि प्रबलश्रुतिविरोध से, पुत्र आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सबके जड़ एवं चैतन्य का आभासमात्र होने से,

२२२ वेदान्तसार घट आदि के समान अनित्य होने के कारण, 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि विद्वानों के अनुभव की प्रबलता से, उन-उन श्रुति, युक्ति और अनुभव आभासों के बाधित होने के कारण भी 'पुत्र आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सभी आत्मा नहीं है।' यही सिद्ध होता है। इसलिए उन-उन सभी वस्तुओं को प्रकाशित करने वाला नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव वाला प्रत्यक्चैतन्य ही आत्मा है एवं वस्तु है, ऐसा ही वेदान्त के विद्वानों का अनुभव भी है। इसप्रकार (यही) अध्यारोप है। 'चन्द्रिका'-इससे पूर्व चार्वाक, बौद्ध, मीमांसक एवं नैयायिकों आदि द्वारा पुत्र आदि को आत्मा बताए गए मतों को पूर्वपक्ष के रूप में स्थापित करने के पश्चात् ग्रन्थकार प्रस्तुत गद्यखण्ड में पुत्र आदि विषयक उन सिद्धान्तों का खण्डन करते हुए अपने मत की प्रस्थापना करते हैं- मोटी बुद्धि वाले अत्यन्त साधारणलोगों एवं चार्वाक, बौद्धसिद्धान्तों के समर्थक विद्वानों द्वारा श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करके, तर्क एवं अनुभवरूप आभास को उद्धृत करते हुए क्रमशः जो आत्मा को पुत्र, शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, अज्ञान, शून्य आदि बताया गया, उसी प्रसङ्ग में वहीं अपने-अपने मत की स्थापना के लिए जो श्रुतिवाक्य तर्क एवं अनुभव रूप प्रमाण प्रस्तुत किए गए, उन-उन श्रुति-युक्ति एवं अनुभवरूप आभासों द्वारा ही पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त का, बाद में प्रतिपादित सिद्धान्त द्वारा स्वतः ही खण्डन हो जाता है। अतः उनका अलग से पुनः खण्डन पिष्टपेषण ही होगा। इसलिए उसका यहाँ खण्डन नहीं किया जा रहा है। साथ ही पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त का बाद में प्रतिपादित सिद्धान्त द्वारा खण्डन होने के कारण शरीर, पुत्र आदि आत्मा नहीं है, यह बात भी स्पष्टरूप से प्रतीत होती है। इसके अलावा अनेक श्रुतिवचनों में उस आन्तरिक शुद्धचैतन्यरूप आत्मा को सूक्ष्म, नेत्रेन्द्रिय आदि से दिखायी न देने वाला, प्राण एवं मन से भिन्न, अकर्ता, चैतन्य, प्रकाशस्वरूप एवं नित्य बताया गया है। इन श्रुतिवचनों की प्रबलता स्वतःसिद्ध है। इसके अतिरिक्त जिन सिद्धान्तों में पुत्र, शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि आदि से लेकर शून्य तक को आत्मा बताया गया है, वे सिद्धान्त स्वतः निरस्त हो जाते हैं, क्योंकि पुत्र आदि से शून्यपर्यन्त आत्मारूप में कहे गए तत्त्व वस्तुतः जड़ हैं, चैतन्य का आभासमात्र हैं।

चार्वाकादिमत-निराकरण २२३

साथ ही घट, पट आदि वस्तुओं के समान अनित्य हैं, नाशवान् हैं, अतः वे आत्मा हो ही नहीं सकते हैं। साथ ही वेदान्त के जीवन्मुक्त विद्वानों ने अपनी साधना द्वारा स्वयं को 'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस रूप में अनुभव भी किया है। उनके अनुभव की प्रबलता को देखते हुए, यही सिद्ध होता है कि इससे पूर्व विभिन्नमत मतान्तर जो पुत्र आदि को आत्मा बताते रहे हैं, वे ठीक नहीं हैं, क्योंकि उन्हीं द्वारा दी गई युक्तियों के आधार पर ही उत्तरोत्तर सिद्धान्त का खण्डन स्वतः ही हो जाता है। अतः पुत्र आदि को आत्मा मानना उचित एवं न्यायसंगत नहीं है। पुनः प्रश्न उठता है कि यदि पुत्रादि आत्मा नहीं है तो फिर आपके मत में आत्मा क्या है? इसी का प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि 'वस्तुतः सदैव विद्यमान रहने वाला पुत्रादि के समान कभी भी विनष्ट न होने वाला, जन्म-मरण आदि दुःखों से रहित, सभीप्रकार के बन्धनों से रहित, अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी भी अन्यप्रकार के प्रकाश की अपेक्षां न रखने वाला, स्वयं प्रकाशक, मुक्तस्वभाव, सभी के अन्तःकरण में विद्यमान रहने वाला, शुद्धचैतन्य ही आत्मा है। यही यथार्थ तत्त्व है, सत्य है। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों के ज्ञाता विद्वानों का अनुभव भी यही है।' इसप्रकार ब्रह्मरूप वस्तु का प्रतिपादन करके ग्रन्थकार कहते हैं कि यही अध्यारोप है कि हम शुद्धचैतन्य को सत्य न मानकर पुत्र आदि को सत्य मान बैठे हैं। अपने अज्ञानवश हमने अवस्तु में वस्तु का आरोप किया हुआ है। किन्तु इस सम्पूर्णप्रसङ्ग में यह शङ्का अत्यन्त स्वाभाविकरूप से होती है कि कुछ श्रुतियों में पुत्र आदि को आत्मा कहा गया है तथा कुछ में उसके आत्मत्व का विरोध किया गया है। इसलिए पुत्रादि के आत्मा होने सम्बन्धी श्रुतियों को अप्रामाणिक कहा जाना तथा आत्मत्वसाधक श्रुतियों को प्रामाणिक मानना, न्यायसंगत नहीं है क्योंकि श्रुति वेदवाक्य है। अतः वहाँ कुछ प्रामाणिक हो तथा कुछ अप्रामाणिक यह संगत नहीं हो सकता है। इसका यही समाधान दिया जा सकता है कि पुत्र आदि को आत्मा बताने वाले श्रुतिवचन सर्वथा अप्रामाणिक नहीं हैं, अपितु उनमें स्थूल का ज्ञान कराकर, साधक को सूक्ष्मविषय की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है। यह जटिलविषय को समझाने की एक शैली कही जा सकती है। इसीको

अपवाद-निरूपण

२२४ वेदान्तसार दार्शनिकभाषा में 'अरुन्धती न्याय'¹ भी कहते हैं। जहाँ सूक्ष्मातिसूक्ष्म विषय को समझाने के लिए पहले स्थूल को बताते हुए क्रमशः सूक्ष्म की ओर बढ़ते हैं। अतः इन श्रुतिवचनों में भी पूर्व-पूर्व में प्रस्तुत श्रुति की अग्रिम श्रुति के प्रति आत्मारूप सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तु का ज्ञान कराने के लिए, आरूढ़ होते हुए सोपान के समान सहयोग की भावना ही परिलक्षित होती है। विशेष-(1) उपर्युक्त वर्णन के आधार पर ग्रन्थकार ने सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है कि शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि आदि से विलक्षण एवं उन सबका अध्यक्ष अन्तरात्मा इन सबसे सर्वथा भिन्न है। (2) पुत्रादिकों के आत्मत्व के सिद्धान्त का खण्डन अत्यन्त सरल एवं संक्षिप्तरूप में किया गया है। (3) ग्रन्थकार ने आत्माविषयक अपने मत का प्रतिपादन श्रुति, तर्क (युक्ति) एवं अनुभववाक्यों द्वारा पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्तों की शैली के आधार पर ही किया है। (4) प्रत्यक् आत्मा (वस्तु) शुद्धचैतन्य चित्र-४७ ┌ श्रुति-प्रत्यगस्थूलोऽचक्षुरप्राणोऽमना │ अकर्ता चैतन्य चिन्मात्रं सत् ├ तर्क-पुत्रादि से लेकर शून्यपर्यन्त सम्पूर्ण │ जड़, घटादि के समान अनित्य └ अनुभव-अहं ब्रह्म अस्मि-मैं ब्रह्म हूँ। अवतरणिका-इसप्रकार अध्यारोपविषयक सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन एवं अद्वैत का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार इसी के द्वितीयपक्ष 'अपवाद' को स्पष्ट करते हैं- अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्ववद्वस्त ुविवर्तस्यावस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्। तदुक्तम्- “सतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विकार इत्युदीरितः।

  1. अरुन्धती न्याय का विस्तृत वर्णन भूमिका में शीर्षक संख्या 24 पृष्ठ संख्या 101 पर द्रष्टव्य है।

अपवाद-निरूपण २२५ अतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विवर्त इत्युदीरित" इति॥ तथाहि। एतद्भोगायतनं चतुर्विधसकलस्थूलशरीरजातं भोग्यरूपान्न- पानादिकमेतदायतनभूतभूरादिचतुर्दशभुवनान्येतदायतनभूतं ब्रह्माण्डं चैतत्सर्वमेतेषां कारणरूपं पञ्चीकृतभूतमात्रं भवति। एतानि शब्दादिविषयसहितानि पञ्चीकृतानि भूतानि सूक्ष्मशरीरजातं चैतत्सर्वमेतेषां कारणरूपापञ्चीकृतभूतमात्रं भवति। एतानि सत्त्वादिगुणसहितान्यपञ्चीकृतान्युत्पत्तिव्युत्क्रमेणैत्कारण- भूताज्ञानोपहितचैतन्यमात्रं भवति। एतदज्ञानमज्ञानोपहितं चैतन्यं चेश्वरादिकमेतदाधारभूतानुपहितचैतन्यरूपं तुरीयं ब्रह्ममात्रं भवति॥२१॥ पदच्छेद- अपवादः नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्ववद्, वस्तुविवर्तस्य अवस्तुनः अज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्। तद् उक्तम्- “सतत्त्वतः अन्यथा प्रथा विकारः इति 'उदीरितः। अतत्त्वतः अन्यथा प्रथा विवर्तः इति उदीरितः॥इति॥ तथाहि, एतद् भोगायतनम् चतुर्विध-सकल-स्थूल-शरीरजातम् भोग्यरूप-अन्नपानादिकम्, एतद् आयतनभूत-भूः आदि चतुर्दश-भुवनानि, एतद्-आयतनभूतम् ब्रह्माण्डम् च एतत् सर्वम्, एतेषाम् कारणरूपम् पञ्चीकृतभूतमात्रम् भवति। एतानि शब्द-आदि विषयसहितानि पञ्चीकृतानि भूतानि सूक्ष्मशरीर-जातम् च एतत् सर्वम् एतेषाम् कारणरूप-अपञ्चीकृतभूतमात्रम् भवति। एतानि सत्त्वादि-गुण-सहितानि अपञ्चीकृतानि उत्पत्तिव्युत्क्रमेण एतत् कारणभूत-अज्ञान-उपहितचैतन्यमात्रम् भवति। एतद् अज्ञानम् अज्ञानोपहितम् चैतन्यम् च ईश्वरादिकम्, एतद् आधारभूत-अनुपहितचैतन्यरूपम् तुरीयम् ब्रह्ममात्रम् भवति॥२१॥ अनुवाद- रस्सी में भ्रान्तिवश प्रतीत होने वाले सर्प की पुनः रस्सीमात्र के रूप में प्रतीति के समान, ब्रह्मरूप वस्तु में मिथ्याप्रतीति के कारण अवस्तुरूप अज्ञानादिप्रपञ्च में, पुनः ब्रह्मरूप सत्यवस्तु का भान होना ही वस्तुतः अपवाद है। इसीलिए कहा है- “अपने मूलरूप का परित्याग करके अन्यरूप को ग्रहण करना ही 'विकार' इसप्रकार कहा गया है। अपने रूप को बिना छोड़े अन्य वस्तु की मिथ्याप्रतीति 'विवर्त' ऐसा कहलाता है।" क्योंकि सुख-दुःखरूप भोग का स्थानरूप ये, उत्पन्न हुए सभी चार प्रकार के स्थूलशरीर, भोग्यरूप अन्न-पान आदि, इसके आयतनभूत भूः

२२६ वेदान्तसार

भुवः, स्वः आदि चौदहलोक एवं उन भुवनों का आधारभूत ब्रह्माण्ड, यह सब, अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों में (विलीन) हो जाता है। शब्द आदि विषयों के साथ ये पञ्चीकृतभूत, सूक्ष्मशरीर समुदाय यह सब इनके कारणरूप अपञ्चीकृतभूतमात्र में (विलीन) हो जाता है। सत्त्व आदि गुणों के साथ ये अपञ्चीकृतभूत भी उत्पत्ति के विपरीतक्रम से अपने कारणभूत अज्ञानोपहितचैतन्यमात्र (में विलीन) हो जाते हैं तथा अज्ञान की उपाधि से युक्त चैतन्य, ईश्वर आदि अपने आधारभूत उपाधिरहित शुद्ध चैतन्यरूप 'तुरीय' ब्रह्ममात्र (में विलीन) हो जाता है। 'चन्द्रिका'- पूर्व में ग्रन्थकार ने अध्यारोप की प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन करते हुए अद्वैत का प्रतिपादन किया। पुनः प्रस्तुत गद्यखण्ड में 'अपवाद' के सिद्धान्त का कथन करते हुए अद्वैत की सिद्धि करते हैं- जैसाकि पूर्व में बताया गया है कि भ्रान्ति के कारण किसी सत्यवस्तु में असत्य की प्रतीति होना 'अध्यारोप' है, किन्तु उस भ्रान्ति का निराकरण करके वस्तु के वास्तविकरूप का ज्ञान प्राप्त करना 'अपवाद' कहलाता है। जिसप्रकार अंधकार आदि के कारण रस्सी में सर्प की मिथ्याप्रतीति होना एवं सीपी में दूरी अथवा दृष्टिदोष आदि के कारण चाँदी की प्रतीति 'अध्यारोप' प्रक्रिया के अन्तर्गत आएगी। जबकि टॉर्च के प्रकाश आदि द्वारा अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा बताए जाने पर या फिर स्वयं ही पास जाकर रस्सी एवं चांदी विषयक भ्रान्तियों को दूर करके, वस्तु के वास्तविकस्वरूप रस्सी अथवा सीपी से परिचित होना ही 'अपवाद' होगा। ठीक इसीप्रकार अज्ञान आदि के कारण ब्रह्मरूप सत्यवस्तु में जगत्रूप प्रपञ्च की मिथ्याप्रतीति होना ही 'अध्यारोप' है एवं सद्गुरु के कुशल मार्गदर्शन अथवा स्वयं के प्रयासों द्वारा तद्विषयक अज्ञान को दूर करके अद्वैततत्त्व तुरीयरूप शुद्धचैतन्य की अर्थात् सत्यवस्तु की प्रतीति होना ही 'अपवाद' माना जाएगा। इसी प्रसङ्ग में अन्यथा प्रतीति के मिथ्याभाव के दो प्रकारों का कथन करते हुए ग्रन्थकार 'विकार' एवं विवर्त को स्पष्ट करते हैं। तदनुसार- "जब कोई वस्तु अपने स्वरूप का परित्याग करके किसी अन्यरूप को ग्रहण कर लेती है तो उसे 'विकार' के अन्तर्गत मानना होगा। जैसे-दूध का दही के रूप में परिवर्तित होना 'विकार' है, क्योंकि दही बनने के बाद उसे पुनः दूध के रूप में बनाना असम्भव है। अपने रूप का त्याग करके ही दूध दही बनता है। इसी प्रक्रिया को परिणाम भी कहा जाता है।

' अपवाद-निरूपण २२७ इसके अतिरिक्त अपने स्वरूप का परित्याग न करते हुए जब किसी वस्तु में अन्य वस्तु की मिथ्याप्रतीति होती है, तो इस प्रक्रिया को हम 'विवर्त' कहेंगे। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति होना, सीपी में चांदी की भ्रान्ति होना विवर्त है, क्योंकि इन दोनों स्थानों पर रस्सी एवं सीपी अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही अन्यरूप को ग्रहण कर लेती हैं। यद्यपि यह रूप भ्रान्ति ही है, फिर भी इसके, क्षणिक ही सही, अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। ठीक इसीप्रकार चराचररूप सम्पूर्णप्रपञ्च शुद्धचैतन्यस्वरूप परमब्रह्म का विवर्त है परिणाम नहीं, क्योंकि सत्यवस्तु ब्रह्म में प्रपञ्च की प्रतीति वस्तुतः मिथ्या है। ज्ञान आदि द्वारा इस मिथ्याप्रतीति को दूर करके तुरीयचैतन्य ब्रह्म ' की तात्त्विकप्रतीति होना ही 'अपवाद' है। जब प्रमाता को इस बात का भलीप्रकार ज्ञान हो जाता है तो यह सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च अपनी उत्पत्ति के विपरीतक्रम में अपने-अपने कारणों में विलीन होता जाता है। इसप्रकार वह मिथ्याप्रतीति विनष्ट हो जाती है तथा अन्त में अद्वैतब्रह्म की सत्ता विद्यमान रहती है, जिसे 'तुरीय' संज्ञा भी प्रदान की गई है, क्योंकि यह स्थूलप्रपञ्च, सूक्ष्मप्रपञ्च एवं कारणशरीर से भिन्न अर्थात् चतुर्थ होता है। वेदान्त की दृष्टि में साधक की यही सर्वोत्कृष्ट स्थिति है। ज्ञान होने के अनन्तर सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च के अपने-अपने कारण में विलय होने के क्रम को ग्रन्थकार ने 'तथाहि' इत्यादि गद्यांश में वर्णित किया है- सुख-दुःख आदि को भोगने वाले जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, अन्नपान आदि सभी भोग्यपदार्थ, भूः भुवः स्वः, महः, जनः तपः और सत्यम् ये सात ऊर्ध्व लोक तथा अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल एवं पाताल आदि सात अधःलोक इसप्रकार कुल मिलाकर चौदहभुवन एवं इन सबका आधारभूत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, ये सभी अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं। तत्पश्चात् अपने शब्दादिगुणों सहित सभी पञ्चीकृतमहाभूत एवं सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर ये सभी अपने कारणरूप अपञ्चीकृतभूतों में विलीन हो जाते हैं। उसके बाद ये अपञ्चीकृतभूत भी अपने-अपने कारण में उल्टेक्रम से इसप्रकार विलीन होते हैं-'पृथिवी जल में, जल अग्नि में,

२२८ वेदान्तसार अग्नि वायु में, वायु अपने कारण आकाश में तथा आकाश अपने कारण अज्ञान से उपहितचैतन्य में विलीन होकर तन्मात्ररूप में विद्यमान हो जाते हैं। इसके पश्चात् यह अज्ञान एवं इससे उपहितसर्वज्ञ आदि गुणों से युक्त चैतन्य ईश्वर आदि भी अपने आधारभूत अनुपहितशुद्धचैतन्यरूप तुरीय ब्रह्म में विलीन हो जाता है। इसप्रकार तुरीयमात्र एक तत्त्व ही शेष बचता है और यही वेदान्त का अद्वैतभाव भी है एवं यही अपवाद का स्वरूप भी, क्योंकि यही परमशुद्धचैतन्य ही वस्तु है, जिसका प्रमाता को तात्त्विकज्ञान हो जाता है। विशेष-(1) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-४८ सृष्टि के विलय की अपवादरूप प्रक्रिया ┌──────────────┬──────────────┬──────────────┐ चतुर्विध शरीर भोग्य अन्नपानादि भूःभुवःस्वः आदि इन सबका └───────┬──────┘ └──────┬──────┘ आधारभूत ब्रह्माण्ड │ │ │ └────────────►┌──────────────┴───────────────┴─┐◄──────────────┘ │ का अपने कारण पञ्चीकृत │ │ आकाश आदि में विलय │ └──────────────┬────────────────┘ │ पञ्चीकृत ┌──────────────┬─────────────┴┬──────────────┬──────────────┐ आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी └──────────────┼─────────────►│◄─────────────┼──────────────┘ │ ┌──────────┴──────────┐ │ └──►│ अपने कारण अपञ्चीकृत │◄──┘ │ आकाश आदि में विलय │ └──────────┬──────────┘ │ अपञ्चीकृत │ आकाश ◄────────── वायु ◄───────── अग्नि ──────────► जल ◄───────── पृथिवी │ │ अज्ञानोपहित शुद्धचैतन्य ───────────────► ┌───────────────┐ ▼ │ शुद्धचैतन्य तुरीय │ ┌───────┐ └───────┬───────┘ │ ईश्वर │ ▼ └───────┘ ( अवशिष्ट ) अवतरणिका-तत्पश्चात् 'अध्यारोप', 'अपवाद' की इन दोनों प्रक्रियाओं से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तत् एवं त्वम् पदार्थों के अर्थों को समझने में इनके सहयोग का कथन करते हैं-

अपवाद-निरूपण २२९ आभ्यामध्यारोपापवादाभ्यां तत्त्वम्पदार्थशोधनमपि सिद्धं भवति। तथाहि। अज्ञानादिसमष्टिरेतदुपहितं सर्वज्ञत्वादिविशिष्टं चैतन्यमेतदनुपहितं चैतत्रयं तप्तायः पिण्डवदेकत्वेनावभासमानं तत्पदवाच्यार्थो भवति। एतदुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं चैतन्यं तत्पदलक्ष्यार्थो भवति। अज्ञानादिव्यष्टिरेतदुपहितालपज्ञत्वादिविशिष्ट चैतन्यमेतदनुपहितं चैतत्रयं तप्तायःपिण्डवदेकत्वेनावभासमानं त्वम्पदवाच्यार्थो भवति। एतदुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं प्रत्यगानन्दं तुरीयं चैतन्यं त्वम्पदलक्ष्यार्थो भवति॥२२॥ पदच्छेद-आभ्याम् अध्यारोप-अपवादाभ्याम् तत्-त्वम् पदार्थशोधनम् अपि सिद्धम् भवति। तथाहि, अज्ञानादिसमष्टिः, एतद् उपहितम् सर्वज्ञत्वादि विशिष्टम् चैतन्यम्, एतद् अनुपहितम् च एतत् त्रयम्-तप्त-अयः पिण्डवद् एकत्वेन अवभासमानम् तत्-पद-वाच्यार्थः भवति। एतद् उपाधि-उपहित- आधारभूतम्-अनुपहितम् चैतन्यम् तत् पदलक्ष्यार्थः भवति। अज्ञान-आदि व्यष्टिः एतद् उपहित-अल्पज्ञत्व-आदि विशिष्टचैतन्यम् एतद् अनुपहितम् च एतत् त्रयम् तप्त-अयःपिण्डवद् एकत्वेन अवभासमानम् त्वम् पदवाच्यार्थः भवति। एतद् उपाधि-उपहित-आधारभूतम् अनुपहितम् प्रत्यक् आनन्दम् तुरीयम् चैतन्यम् त्वम् पद-लक्ष्यार्थः भवति॥२२॥ अनुवाद-इन दोनों अध्यारोप-अपवाद द्वारा तत् एवम् त्वम् पदों के अर्थों का स्पष्टीकरण भी सिद्ध हो जाता है, क्योंकि-अज्ञान आदि की समष्टि, इन सर्वज्ञत्वादि विशेषणों की उपाधि से युक्त चैतन्य (अर्थात् ईश्वर) एवं इस उपाधि से शून्य (शुद्धचैतन्य), ये तीनों-तप्तलोहपिण्ड के समान एक ही प्रतीत होने के कारण, तत् पद के वाच्यार्थ होते हैं तथा इस उपाधि से युक्त (उन सबका) आधारभूत अनुपहित चैतन्य, तत् पद का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा प्रतिपादित लक्ष्यार्थ होता है। अज्ञान आदि व्यष्टि, इसकी उपाधि अल्पज्ञत्व आदि विशेषताओं से युक्त चैतन्य (अर्थात् जीव) तथा इसकी उपाधि से रहित शुद्धचैतन्य, ये तीनों (एक साथ) तप्तलोहपिण्ड के समान अभिन्न प्रतीत होने के कारण, त्वम् पद के वाच्यार्थ होते हैं। इस उपाधि से युक्त (उन सबका) आधारभूत अनुपहित आनन्दरूप तुरीयचैतन्य त्वम् पद (लक्षणाशब्दशक्ति द्वारा प्राप्त) का लक्ष्यार्थ होता है। 1

२३० वेदान्तसार 'चन्द्रिका'—इसप्रकार अध्यारोप एवं अपवादरूप दोनों सिद्धान्तों को भलीप्रकार समझने के बाद यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि सम्पूर्ण चराचर नामरूपात्मक जगत् ही वस्तुतः ब्रह्म है तथा ब्रह्म ही सम्पूर्ण चराचर नामरूपात्मक संसार है। साथ ही 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के अर्थों का अभिप्राय भी पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाता है। तदनुसार-अज्ञान, कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर की समष्टि तथा इनकी उपाधि से युक्त चैतन्य, सर्वज्ञता, व्यापकता आदि गुणों से विशिष्ट ईश्वर, हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) और विराट् (वैश्वानर) रूप चैतन्य एवं इन सब उपाधियों से रहित तुरीय ब्रह्मरूप शुद्धचैतन्य, इन सब में ठीक उसीप्रकार अभिन्नता विद्यमान है, जिसप्रकार तप्त लोहपिण्ड कहने पर लोहपिण्ड एवं अग्नि में अभिन्नता की प्रतीति होती है। यही इस तत् पद का वाच्यार्थ अर्थात् अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्राप्त सीधा अर्थ है। इसके अतिरिक्त अज्ञान से उपहित ईश्वररूप चैतन्य का आधार जो उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है, उसका अज्ञान एवं उससे आच्छादित ईश्वर रूप चैतन्य से अलग-अलगरूप में प्रकाशित होना ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ है। इस भाव को 'तप्तायः पिण्डः' इस उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझा जा सकता है। तपे हुए लोहपिण्ड से जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' ऐसा सामान्यरूप से कहा जाता है, जबकि दाहकताशक्ति लोहे में न होकर अग्नि में विद्यमान रहती है। इसलिए अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतिपादित इस साक्षात् संकेतित अर्थ, वाच्यार्थ में अग्नि एवं लोह में अभिन्नतारूप अर्थ ही प्रमुखता लिए होता है। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य में भी 'तत्' अर्थात् शुद्धचैतन्य (तुरीय) एवं त्वम् अर्थात् उपाधियुक्त चैतन्य (जीव) की अभिन्नता का कथन ही मुख्यप्रयोजन होने से इसका वाच्यार्थ अर्थात् सीधा अर्थ कहलाएगा। इसके अतिरिक्त 'तप्तायः पिण्ड' इत्यादि उदाहरण में दाहकताशक्ति लोहे में विद्यमान न होने के कारण 'लोहे से जल गया' ऐसा कहने पर मुख्य अर्थ का बाध होने पर लक्षणा शब्दशक्ति से 'अग्नि' रूप अर्थ के साथ 'लोहे में स्थित अग्नि से जल गया' इसप्रकार लक्ष्यार्थ की प्रतीति में अग्नि एवं लोहे की भिन्नता की प्रतीति कराना ही मुख्यप्रयोजन होगा। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद से प्रतीत होने वाले शुद्धचैतन्य

महावाक्यार्थ-निरूपण २३१ एवं 'त्वम्' से प्रतीत होने वाले उपाधियुक्त चैतन्य में, दोनों की विशिष्टता में अभिप्राय होने की दृष्टि से, दोनों को भिन्न-भिन्न प्रतिपादित करना रूप अर्थ लक्ष्यार्थ होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों में प्रत्येक के दो-दो अर्थ हैं-प्रथम वाच्यार्थ एवं द्वितीय लक्ष्यार्थ। इस दृष्टि से अज्ञान की सम्पूर्ण समष्टि, तद् अवच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वर, हिरण्यगर्भ और वैश्वानर एवं इन सबसे भिन्न अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे अक्षर एवं सच्चिदानन्दस्वरूप तुरीय कहा गया है, ये तीनों तपे हुए लोहपिण्ड के समान एक ही हैं और यही यहाँ तत् शब्द का वाच्यार्थ है। इसके अलावा अज्ञान एवं उसका कार्यरूप समस्त चराचरप्रपञ्च, उसे स्फूर्ति प्रदान करने वाली, यहाँ तक कि ईश्वर आदि चैतन्य की भी आधारस्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, अज्ञान आदि की उपाधि से रहित, परमशुद्धचैतन्य तुरीय नामक यथार्थवस्तु इन सबकी अलग-अलग प्रतीति ही तत् पद का लक्ष्यार्थ है। इसीप्रकार व्यष्टिभूत अज्ञान, उससे अवच्छिन्न अल्पज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट प्राज्ञ, तैजस् एवं विश्वचैतन्य एवं इन सभी का आधारभूत शुद्ध चैतन्य ये तीनों भी 'तपे हुए लोहपिण्ड' के समान एक ही हैं। यह यहाँ त्वम् पद का वाच्यार्थ है तथा अज्ञान आदि उपाधियों से युक्त प्राज्ञ, तैजस् और विश्व एवं इन सबका आधार अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे प्रत्यगानन्द तुरीय भी कहा गया है ये सभी अलग-अलग हैं, यह 'त्वम्' पद का लक्ष्यार्थ है। अतः अनुपहित शुद्धचैतन्य तत् एवं त्वम् इन दोनों पदों का लक्ष्यार्थ है। इसीलिए तत् एवं त्वम् ये दोनों पद यहाँ लक्षण हैं तथा शुद्धचैतन्य लक्ष्य है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने अब तक प्रतिपादित अध्यारोप एवं अपवाद के सिद्धान्तों द्वारा 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य में प्रयुक्त तत् एवं त्वम् पदों के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को बताते हुए उनके अर्थों को स्पष्ट किया है। (2) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी अभिव्यक्त कर सकते हैं-