भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 314 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 227

स्थूलमहाप्रपञ्च २१३ विविक्तं सलक्ष्यमपि भवति। एवं वस्तुन्य वस्त्वारोपोऽध्यारोपः सामान्येन प्रदर्शितः ॥१८॥ पदच्छेद-एतेषाम् स्थूल-सूक्ष्मकारणप्रपञ्चानाम् अपि समष्टिः एकः महान् प्रपञ्चः भवति, यथा- अवान्तर वनानाम् समष्टिः एकम् महद्वनम् भवति। यथा वा अवान्तर-जलाशयानाम् समष्टिः एकः महान् जलाशयः। एतद् उपहितम् वैश्वानराद् ईश्वरपर्यन्तम् चैतन्यम् अपि अवान्तर वन-अवच्छिन्न-आकाशवद् अवान्तर जलाशयगत-प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च एकम् एव। आभ्याम् महाप्रपञ्च तद् उपहित-चैतन्याभ्याम् तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सद् अनुपहितम् चैतन्यम् “सर्वं खलु इदं ब्रह्म” इति वाक्यस्य वाच्यम् भवति, विविक्तम् सत् लक्ष्यम् अपि भवति। एवम् वस्तुनि अवस्तु-आरोपः अध्यारोपः सामान्येन प्रदर्शितः।।18।। अनुवाद-जिसप्रकार अलग-अलग वनों का समूह एक महान् वन हो जाता है अथवा जिसप्रकार पृथक्-पृथक् जलाशयों का समुदाय एक महान् जलाशय बन जाता है, (ठीक उसीप्रकार) इन स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण प्रपञ्चों की समष्टि भी एक महान्प्रपञ्च हो जाता है। इस उपाधि से उपहित वैश्वानर से लेकर ईश्वरपर्यन्त चैतन्य भी अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश के समान तथा भिन्न-भिन्न जलाशयों में प्रतिबिम्बित आकाश के समान एक ही होता है। ‘चन्द्रिका’-ग्रन्थकार ने यहाँ तक, कारणशरीर, समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से जिसमें स्थित चैतन्य ईश्वर एवं प्राज्ञ कहलाता है। सूक्ष्मशरीर, समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से जिसमें स्थित चैतन्य क्रमशः हिरण्यगर्भ अथवा सूत्रात्मा एवं तैजस् कहा जाता है। ठीक इसीप्रकार स्थूलशरीर, जिसमें स्थित चैतन्य समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से क्रमशः वैश्वानर (विराट्) एवं विश्व कहलाता है, का प्रतिपादन किया। जिसप्रकार आम, शीशम, पलाश आदि भिन्न-भिन्न वनों की समष्टि से एक विशालकाय महावन का निर्माण होता है तथा वापी, कूप, तालाब आदि अलग-अलग जलाशयों की समष्टि से एक विशाल महान् जलाशय बन जाता है। ठीक इसीप्रकार अभी तक बताए गए कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूल- शरीरों की समष्टि को मिलाकर एक महाप्रपञ्च का निर्माण होता है तथा जिसप्रकार वन से अवच्छिन्न आकाश एवं वृक्षों से अवच्छिन्न-आकाश में कोई भेद नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार इन तीनों प्रकार के प्रपञ्चों में स्थित चैतन्यों में अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न आकाश के समान, अलग-अलग जलाशयों