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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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२२६ वेदान्तसार

भुवः, स्वः आदि चौदहलोक एवं उन भुवनों का आधारभूत ब्रह्माण्ड, यह सब, अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों में (विलीन) हो जाता है। शब्द आदि विषयों के साथ ये पञ्चीकृतभूत, सूक्ष्मशरीर समुदाय यह सब इनके कारणरूप अपञ्चीकृतभूतमात्र में (विलीन) हो जाता है। सत्त्व आदि गुणों के साथ ये अपञ्चीकृतभूत भी उत्पत्ति के विपरीतक्रम से अपने कारणभूत अज्ञानोपहितचैतन्यमात्र (में विलीन) हो जाते हैं तथा अज्ञान की उपाधि से युक्त चैतन्य, ईश्वर आदि अपने आधारभूत उपाधिरहित शुद्ध चैतन्यरूप 'तुरीय' ब्रह्ममात्र (में विलीन) हो जाता है। 'चन्द्रिका'- पूर्व में ग्रन्थकार ने अध्यारोप की प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन करते हुए अद्वैत का प्रतिपादन किया। पुनः प्रस्तुत गद्यखण्ड में 'अपवाद' के सिद्धान्त का कथन करते हुए अद्वैत की सिद्धि करते हैं- जैसाकि पूर्व में बताया गया है कि भ्रान्ति के कारण किसी सत्यवस्तु में असत्य की प्रतीति होना 'अध्यारोप' है, किन्तु उस भ्रान्ति का निराकरण करके वस्तु के वास्तविकरूप का ज्ञान प्राप्त करना 'अपवाद' कहलाता है। जिसप्रकार अंधकार आदि के कारण रस्सी में सर्प की मिथ्याप्रतीति होना एवं सीपी में दूरी अथवा दृष्टिदोष आदि के कारण चाँदी की प्रतीति 'अध्यारोप' प्रक्रिया के अन्तर्गत आएगी। जबकि टॉर्च के प्रकाश आदि द्वारा अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा बताए जाने पर या फिर स्वयं ही पास जाकर रस्सी एवं चांदी विषयक भ्रान्तियों को दूर करके, वस्तु के वास्तविकस्वरूप रस्सी अथवा सीपी से परिचित होना ही 'अपवाद' होगा। ठीक इसीप्रकार अज्ञान आदि के कारण ब्रह्मरूप सत्यवस्तु में जगत्रूप प्रपञ्च की मिथ्याप्रतीति होना ही 'अध्यारोप' है एवं सद्गुरु के कुशल मार्गदर्शन अथवा स्वयं के प्रयासों द्वारा तद्विषयक अज्ञान को दूर करके अद्वैततत्त्व तुरीयरूप शुद्धचैतन्य की अर्थात् सत्यवस्तु की प्रतीति होना ही 'अपवाद' माना जाएगा। इसी प्रसङ्ग में अन्यथा प्रतीति के मिथ्याभाव के दो प्रकारों का कथन करते हुए ग्रन्थकार 'विकार' एवं विवर्त को स्पष्ट करते हैं। तदनुसार- "जब कोई वस्तु अपने स्वरूप का परित्याग करके किसी अन्यरूप को ग्रहण कर लेती है तो उसे 'विकार' के अन्तर्गत मानना होगा। जैसे-दूध का दही के रूप में परिवर्तित होना 'विकार' है, क्योंकि दही बनने के बाद उसे पुनः दूध के रूप में बनाना असम्भव है। अपने रूप का त्याग करके ही दूध दही बनता है। इसी प्रक्रिया को परिणाम भी कहा जाता है।