वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्थूलमहाप्रपञ्च २१५ वस्तुतः उपर्युक्त 'अयो दहति' वाक्य का लक्ष्यार्थ माना जाएगा, क्योंकि यहाँ 'अय स्' शब्द की अयोगत अग्नि में लक्षणा की गयी है। ठीक इसीप्रकार 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' यह सब कुछ दृश्यमानजगत् ही ब्रह्म है। महावाक्य के इस वाच्यार्थ में महाप्रपञ्च, उससे उपहित चैतन्य एवं शुद्धचैतन्य ये तीनों एक कैसे हो सकते हैं? इस आशङ्का से मुख्य अर्थ का बाध होने से लक्षणा करनी होगी तथा उस स्थिति में विशेषणरूप अंश का परित्याग करके चैतन्यमात्र को ग्रहण करेंगे। ऐसा करने पर महाप्रपञ्च से उपहितचैतन्य एवं परमशुद्धचैतन्य दोनों एक हो जाएंगे। परिणामस्वरूप सर्वप्रपञ्च एवं चैतन्य की एकता स्वतःसिद्ध हो जाएगी। इसप्रकार यहाँ तक वस्तु में अवस्तु के आरोपरूप अध्यारोप का सामान्यरूप से वर्णन किया गया। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में सृष्टिविकास के कारण, सूक्ष्म एवं स्थूलशरीररूप विकास की अवस्थाओं में प्रतीत होने वाले भेदों में चैतन्य की दृष्टि से अभेद की स्थापना की गई है। (3) महाप्रपञ्च का सोदाहरण निरुपण किया गया है। (4) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-४५ महाप्रपञ्च महावन महासरोवर आम्रवन समष्टि वापी पलाशवन तडाग खदिरवन सरोवर कारणशरीर सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर समष्टि व्यष्टि समष्टि व्यष्टि समष्टि व्यष्टि ईश्वर प्राज्ञ हिरण्यगर्भ तेजस् वैश्वानर विश्व अभिन्नता चैतन्य का ऐक्य भिन्नता चैतन्य से प्रपञ्च की सर्वं खल्विदं ब्रह्म प्रपञ्च+चैतन्य-भिन्नता अभिन्नता लोह एवं अग्नि की अयोहति लोह+अग्नि-भिन्नता अभिन्नता लोहे से जल गया अग्नि लोहे में स्थित अग्नि से जल गया वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ