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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 314 में से

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महावाक्यार्थ-निरूपण २३१ एवं 'त्वम्' से प्रतीत होने वाले उपाधियुक्त चैतन्य में, दोनों की विशिष्टता में अभिप्राय होने की दृष्टि से, दोनों को भिन्न-भिन्न प्रतिपादित करना रूप अर्थ लक्ष्यार्थ होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों में प्रत्येक के दो-दो अर्थ हैं-प्रथम वाच्यार्थ एवं द्वितीय लक्ष्यार्थ। इस दृष्टि से अज्ञान की सम्पूर्ण समष्टि, तद् अवच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वर, हिरण्यगर्भ और वैश्वानर एवं इन सबसे भिन्न अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे अक्षर एवं सच्चिदानन्दस्वरूप तुरीय कहा गया है, ये तीनों तपे हुए लोहपिण्ड के समान एक ही हैं और यही यहाँ तत् शब्द का वाच्यार्थ है। इसके अलावा अज्ञान एवं उसका कार्यरूप समस्त चराचरप्रपञ्च, उसे स्फूर्ति प्रदान करने वाली, यहाँ तक कि ईश्वर आदि चैतन्य की भी आधारस्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, अज्ञान आदि की उपाधि से रहित, परमशुद्धचैतन्य तुरीय नामक यथार्थवस्तु इन सबकी अलग-अलग प्रतीति ही तत् पद का लक्ष्यार्थ है। इसीप्रकार व्यष्टिभूत अज्ञान, उससे अवच्छिन्न अल्पज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट प्राज्ञ, तैजस् एवं विश्वचैतन्य एवं इन सभी का आधारभूत शुद्ध चैतन्य ये तीनों भी 'तपे हुए लोहपिण्ड' के समान एक ही हैं। यह यहाँ त्वम् पद का वाच्यार्थ है तथा अज्ञान आदि उपाधियों से युक्त प्राज्ञ, तैजस् और विश्व एवं इन सबका आधार अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे प्रत्यगानन्द तुरीय भी कहा गया है ये सभी अलग-अलग हैं, यह 'त्वम्' पद का लक्ष्यार्थ है। अतः अनुपहित शुद्धचैतन्य तत् एवं त्वम् इन दोनों पदों का लक्ष्यार्थ है। इसीलिए तत् एवं त्वम् ये दोनों पद यहाँ लक्षण हैं तथा शुद्धचैतन्य लक्ष्य है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने अब तक प्रतिपादित अध्यारोप एवं अपवाद के सिद्धान्तों द्वारा 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य में प्रयुक्त तत् एवं त्वम् पदों के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को बताते हुए उनके अर्थों को स्पष्ट किया है। (2) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी अभिव्यक्त कर सकते हैं-