वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंचार्वाकादिमत-निराकरण २९९ का अज्ञान में लय होता देखने से, 'मैं अज्ञानी हूँ', 'मैं अज्ञानी हूँ', इत्यादि अनुभव के कारण, 'अज्ञान ही आत्मा है' इसप्रकार कहते हैं। (8) कुमारिलभट्ट के (मतानुयायी) तो 'अज्ञानघन और आनन्दमय ही आत्मा है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, सुषुप्ति अवस्था में प्रकाश एवं अप्रकाश दोनों के विद्यमान होने से, 'मैं स्वयं को नहीं जानता हूँ', इत्यादि अनुभव के कारण, 'अज्ञानरूप उपाधि से युक्त चैतन्य ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है। (9) अन्य बौद्ध (मतानुयायी) - 'सृष्टि से पूर्व यह असत् (शून्य) ही था' इत्यादि श्रुति का वचन, सुषुप्ति अवस्था में सबका अभाव होने के कारण, 'मैं सुषुप्ति अवस्था में नहीं था' उठने पर ऐसे अपने अभावरूप परामर्शविषयक अनुभव होने के कारण, 'शून्य ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है। 'चन्द्रिका' - उक्त अंश की व्याख्या के लिए द्रष्टव्य भूमिका में शीर्षक (23) - आत्मा विषयक विभिन्न मत। पृष्ठ संख्या-(98)। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार के समय में आत्मा के सम्बन्ध में प्रचलितमतों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। (2) यहाँ आत्मा के सम्बन्ध में स्थूलतम से सूक्ष्म की ओर जाते हुए तत्तत् मत को श्रुति, तर्क एवं अनुभव के आधार पर पुष्ट करते हुए पूर्वपक्ष का प्रतिपादन किया गया है। (3) चार्वाक-नास्तिक विचारधारा के लोग, जो केवल भोगवाद में विश्वास करते थे। इनकी बातें सामान्यतया सुनने में अच्छी लगने के कारण सम्भवतः इन्हें 'चारु वाक्' कहा गया। (4) अपरः चार्वाकः शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनसमय में सम्भवतः चार्वाक मतावलम्बियों में भी भिन्न-भिन्न मत विद्यमान थे। (5) मतसंख्या तीन में 'प्राण' शब्द 'इन्द्रिय' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। (6) प्रकाशाप्रकाशसद्भावात्-सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों ही विद्यमान रहते हैं। यहाँ प्रकाश, ज्ञान का तथा अप्रकाश, अज्ञान का प्रतीक है। (7) प्रज्ञानघन से अभिप्राय अज्ञान की अपेक्षा ज्ञान के आधिक्य से है। (8) 'भाट्ट' शब्द का प्रयोग कुमारिलभट्ट के अनुयायी मीमांसकों के लिए प्रयुक्त हुआ है।