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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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२२२ वेदान्तसार घट आदि के समान अनित्य होने के कारण, 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि विद्वानों के अनुभव की प्रबलता से, उन-उन श्रुति, युक्ति और अनुभव आभासों के बाधित होने के कारण भी 'पुत्र आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सभी आत्मा नहीं है।' यही सिद्ध होता है। इसलिए उन-उन सभी वस्तुओं को प्रकाशित करने वाला नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव वाला प्रत्यक्चैतन्य ही आत्मा है एवं वस्तु है, ऐसा ही वेदान्त के विद्वानों का अनुभव भी है। इसप्रकार (यही) अध्यारोप है। 'चन्द्रिका'-इससे पूर्व चार्वाक, बौद्ध, मीमांसक एवं नैयायिकों आदि द्वारा पुत्र आदि को आत्मा बताए गए मतों को पूर्वपक्ष के रूप में स्थापित करने के पश्चात् ग्रन्थकार प्रस्तुत गद्यखण्ड में पुत्र आदि विषयक उन सिद्धान्तों का खण्डन करते हुए अपने मत की प्रस्थापना करते हैं- मोटी बुद्धि वाले अत्यन्त साधारणलोगों एवं चार्वाक, बौद्धसिद्धान्तों के समर्थक विद्वानों द्वारा श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करके, तर्क एवं अनुभवरूप आभास को उद्धृत करते हुए क्रमशः जो आत्मा को पुत्र, शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, अज्ञान, शून्य आदि बताया गया, उसी प्रसङ्ग में वहीं अपने-अपने मत की स्थापना के लिए जो श्रुतिवाक्य तर्क एवं अनुभव रूप प्रमाण प्रस्तुत किए गए, उन-उन श्रुति-युक्ति एवं अनुभवरूप आभासों द्वारा ही पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त का, बाद में प्रतिपादित सिद्धान्त द्वारा स्वतः ही खण्डन हो जाता है। अतः उनका अलग से पुनः खण्डन पिष्टपेषण ही होगा। इसलिए उसका यहाँ खण्डन नहीं किया जा रहा है। साथ ही पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त का बाद में प्रतिपादित सिद्धान्त द्वारा खण्डन होने के कारण शरीर, पुत्र आदि आत्मा नहीं है, यह बात भी स्पष्टरूप से प्रतीत होती है। इसके अलावा अनेक श्रुतिवचनों में उस आन्तरिक शुद्धचैतन्यरूप आत्मा को सूक्ष्म, नेत्रेन्द्रिय आदि से दिखायी न देने वाला, प्राण एवं मन से भिन्न, अकर्ता, चैतन्य, प्रकाशस्वरूप एवं नित्य बताया गया है। इन श्रुतिवचनों की प्रबलता स्वतःसिद्ध है। इसके अतिरिक्त जिन सिद्धान्तों में पुत्र, शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि आदि से लेकर शून्य तक को आत्मा बताया गया है, वे सिद्धान्त स्वतः निरस्त हो जाते हैं, क्योंकि पुत्र आदि से शून्यपर्यन्त आत्मारूप में कहे गए तत्त्व वस्तुतः जड़ हैं, चैतन्य का आभासमात्र हैं।