वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१८६ वेदान्तसार अहंकार दोनों का अन्तर्भाव हो जाता है। ये सभी वस्तुतः आकाश आदि में स्थित सात्त्विक अंशों के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होते हैं। इनके प्रकाशात्मक होने के कारण (ही इन्हें) सात्त्विक अंशों का कार्य कहा गया है। पञ्चज्ञानेन्द्रियों सहित यह बुद्धि ही विज्ञानमयकोश होती है। यही (कोश) कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी आदि के अभिमानविषयकभाव के कारण, इसलोक एवं परलोक में आवागमन करने वाला, व्यावहारिकरूप में 'जीव' इसप्रकार कहा जाता है। जबकि ज्ञानेन्द्रियों से युक्त मन ही मनोमयकोश होता है। 'चन्द्रिका'-सूक्ष्मशरीर में कुल मिलाकर सत्रह अवयव होते हैं। इसी सूक्ष्मशरीर का दूसरा नाम लिङ्ग शरीर भी है। तत्पश्चात् ग्रन्थकार इन सत्रह अवयवों को गिनाते हैं-ये सत्रह अवयव इसप्रकार हैं-श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा तथा घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि दो अन्तरिन्द्रिय तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान ये पाँच वायु कुल मिलाकर सत्रह अवयव हो जाते हैं। तत्पश्चात् श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा एवं घ्राण इन पञ्चज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति को कहते हैं-ये सभी ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्मभूत आकाश आदि के सात्त्विक अंशों से क्रमशः अलग-अलग इसप्रकार उत्पन्न होते हैं। जैसे-आकाश के सात्त्विक अंश से 'श्रोत्र' नामक ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न होती है। इसका गुण 'शब्द' है। अतः यह शब्द को ग्रहण करने का कार्य करती है। इसीप्रकार वायु के सात्त्विक अंश से 'त्वक्' नामक ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न होती है। इसका गुण 'स्पर्श' है। अतः यह शीतोष्णादि का ज्ञान कराती है। इसके अतिरिक्त अग्नि के सात्त्विक अंश से 'चक्षु' की उत्पत्ति होती है। इसका गुण 'रूप' है। अतः यह ज्ञानेन्द्रिय दृश्यमानजगत् के 'दर्शन' में सहायिका होती है। जबकि जल के सात्त्विक अंश से जिह्वा अर्थात् 'रसना' नामक ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न होती है। 'रस' इसका गुण होने से यह मधुर, अम्ल लवण, कटु, कषाय एवं तिक्त इत्यादि षड्रसों को ग्रहण करती है। इसीप्रकार पृथ्वी के सात्त्विक अंश से 'घ्राण' नाम ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति मानी गई है। पृथ्वी का गुण 'गन्ध' होने से यह इन्द्रिय गन्ध को ग्रहण करने का कार्य करती है।