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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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सूक्ष्मशरीर निरूपण १८७ पुनः बुद्धि एवं मन को परिभाषित करते हैं—'यह बात पूर्णरूप से ऐसी ही है' इसप्रकार निश्चय करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति 'बुद्धि' कहलाती है तथा 'यह ऐसा है अथवा नहीं' इसप्रकार संशय करने वाला अन्तःकरण का व्यापार ही 'मन' है। दूसरे शब्दों में अन्तःकरण की वृत्ति के दो रूप कहे जा सकते हैं (1) निश्चयात्मिकावृत्ति अर्थात् बुद्धि (2) संशयात्मिका वृत्ति अर्थात् मन। ग्रन्थकार के अनुसार—कुछ विद्वान् चित्त और अहंकार नामक अन्य दो वृत्तियों का उल्लेख भी करते हैं, किन्तु उन दोनों का क्रमशः इन्हीं बुद्धि और मन में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अतः उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है। ये सभी अर्थात् बुद्धि, मन तथा इन्हीं में अन्तर्भूत हुई चित्त एवं अहंकार नामक अन्तःकरण की सभी वृत्तियाँ सूक्ष्म आकाश आदि में स्थित सात्त्विक अंशों के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होते हैं। वस्तुतः मन एवं बुद्धि के सहयोग के अभाव में ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण नहीं कर पाती हैं। इसीकारण यहाँ उन्हें पञ्चसूक्ष्मभूतों के मिश्रित अंशों से उत्पन्न बताया गया है। पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, बुद्धि एवं मन ये सात अपञ्चीकृत पञ्चभूतों के सात्त्विक अंशों से उत्पन्न इसलिए माने गए हैं, क्योंकि ये सभी पदार्थों को प्रकाशित करने की क्षमता वाले हैं तथा शास्त्रों में सत्त्वगुण को प्रकाशक माना गया है—गीता का इस विषय में कहना है—"तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्।" कारण के गुण ही कार्य में भी विद्यमान रहते हैं। इसी सिद्धान्त की दृष्टि से उक्त सात की उत्पत्ति आकाशादि के सात्त्विक अंशों से मानी गयी है। पञ्चज्ञानेन्द्रियों सहित बुद्धि 'विज्ञानमयकोश' कहलाती है। इसी कोश से युक्त चैतन्य अपने आपको काम का करने वाला, भोगों को भोगने वाला, सुख एवं दुःख का अनुभव करने वाला मानता है। इसीकारण उसे स्वर्गलोक एवं मृत्युलोक आदि में आवागमन करना पड़ता है। व्यावहारिक अवस्था में इसी विज्ञानमयकोश से युक्त चैतन्य को 'जीव' भी कहा जाता है। इस प्रसंग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि चिदात्मा वस्तुतः कर्ता, भोक्ता आदि न होने पर भी विज्ञानमयकोश में अभिमानभाव के कारण ही लोक-परलोक में गमनागमनरूप व्यवहार का हेतु बन जाता है।