वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१८८ वेदान्तसार इसी भाव के कारण व्यावहारिकदृष्टि से वह 'जीव' इस संज्ञा को प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त पञ्चज्ञानेन्द्रियों के साथ मन के मिलने पर 'मनोमय कोश' का निर्माण होता है। आत्मा को ढकने वाला होने के कारण (आच्छादक) ही इन्हें 'कोशसंज्ञा' प्रदान की गई है। इन मनोमय एवं विज्ञानमय 'कोशों की कार्यसम्पादन की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। सामान्यतया विषय ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सर्वप्रथम मन के पास पहुँचता है। संकल्प-विकल्प करने के बाद वह उसे बुद्धि को सौंप देता है। तत्पश्चात् ही बुद्धि उसके विषय में निश्चयात्मक निर्णय लेती है। विशेष-(1) सांख्यदर्शन में भी सूक्ष्मशरीर को मान्यता प्रदान की गई है, किन्तु वहाँ इसके अट्ठारह अवयवों का उल्लेख किया गया है।^1 वहाँ उन्होंने अहंकार का अधिक कथन किया है। (2) सूक्ष्मशरीर को ही लिङ्गशरीर भी कहा गया है। इसका कारण इसके द्वारा प्रत्यगात्मा की सत्ता का ज्ञापन माना गया है-लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भावः एभिरिति लिङ्गानि, लिङ्गानि च तानि शरीराणि इति लिङ्गशरीराणि। (3) शतपथब्राह्मण ने भी 'सप्तदशः प्रजापति' कहकर सूक्ष्मशरीर के सत्रह अवयवों को ही मान्यता प्रदान की है। (4) पञ्चदशीकार ने भी सूक्ष्मशरीर को सत्रह अवयवों से युक्त बताया है- बुद्धिः कर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते।। (5) सांख्य के समान वेदान्त आकाशादि पञ्चसूक्ष्मभूतों की उत्पत्ति एक साथ नहीं मानता है, अपितु यहाँ आकाश से उत्तरोत्तर सूक्ष्मभूतों की उत्पत्ति को मान्यता प्रदान की गई है। जो अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक प्रतीत होती है। (6) मन और बुद्धि को अन्तः इन्द्रिय होने के कारण अन्तःकरण कहा गया है। करण शब्द का प्रयोग 'साधकतमं करणम्' परिभाषा के अनुसार इसके महत्त्व को प्रदर्शित करता है।
- द्रष्टव्य लेखककृत-सांख्यकारिका-संस्कृतग्रन्थागार, दिल्ली से प्रकाशित।