वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 208 of 314
Read in context१९४ वेदान्तसार के संकल्प-विकल्पात्मक सहयोग द्वारा बुद्धि ही वस्तु के विषय में 'ग्राह्य' अथवा 'त्याज्य' निर्णय करती है। इसके अतिरिक्त इसी विज्ञानमयकोश में ही चैतन्यतत्त्व के साथ अपेक्षाकृत अधिक निकटता होती है। अतः इसकी प्रधानता स्वतःसिद्ध है। बुद्धि का प्राधान्य होने से यह ज्ञानशक्तिसम्पन्न माना गया है। साथ ही प्रत्येक वस्तु के साथ भोक्ताभाव होने एवं कर्तृत्व का अभिमान होने के कारण यही कोश कर्ता कहा जाता है। श्रुतिवचन भी इसमें प्रमाण है- “योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिःपुरुषः” इसीप्रकार मनोमयकोश इच्छाशक्तिसम्पन्न होता है। विषय को बुद्धि के पास तक पहुँचाने में मन एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता हैं, क्योंकि बुद्धि एवं इन्द्रियों के कार्य करने पर भी मन के इधर-उधर होने अर्थात् उस विषय में सम्यक्रूप से उपस्थित न होने से बुद्धि, विषय को ग्रहण नहीं कर पाती है। 'मेरा मन अन्यत्र था, अतः मैंने नहीं सुना' इत्यादि अनुभव इस कथन की पुष्टि में प्रमाण है। इसलिए सिद्ध होता है कि ज्ञान के होने अथवा न होने में मन 'साधकतम' की भूमिका का निर्वाह करता है। इसीलिए उसे यहाँ करणरूप में प्रतिपादित किया गया है। प्राणमयकोश के अन्तर्गत पञ्चकर्मेन्द्रियाँ एवं पञ्चप्राण आते हैं। सूक्ष्म भूत आकाशादि के रजोंऽशों से इनका निर्माण होता है। गीता एवं सांख्यदर्शन ने रजोगुण को क्रियाशील माना है-‘रजः कर्मणि भारत’-गीता, 'उपष्टम्भकं चलं च रजः' (सांख्यकारिका)। रजोंऽश का कार्य होने के कारण प्राणमय कोश में क्रियाशीलता के दर्शन होते हैं। वाणीरूप कर्मेन्द्रिय बोलने का, हाथ आदान-प्रदान का, पैर चलने का तथा पायु एवं उपस्थ मलमूत्र के निस्सारण का कार्य करती हैं। ठीक इसीप्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में निवास करने वाले प्राण, आदि वायु भी शरीर को स्वस्थ रखते हुए उसे गतिशील बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसीलिए क्रियाशक्ति सम्पन्न होने से प्राणमयकोश को कार्यरूप बताया गया है। श्रुति का यह वचन भी इसके कार्यरूपत्व को सिद्ध करता है- “तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत” इसप्रकार विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों में अलग-अलग क्रमशः कर्ता, करण एवं क्रियारूप योग्यता होने के कारण ही