वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextसूक्ष्मशरीर निरूपण १९५ इनकी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ही इन्हें शास्त्रों में उक्त कर्ता आदि नामों के रूप में विभक्त किया गया है। अर्थात् उपर्युक्त विभाग एवं नामकरण का आधार मुख्यतया इन कोशों की अपनी योग्यता एवं क्षमता ही है। अन्य कुछ नहीं। अतः विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय ये तीनों कोश मिलकर ही 'सूक्ष्मशरीर' कहलाते हैं। विशेष- (1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में विज्ञानमयकोश को कर्ता, मनोमय को करण तथा प्राणमयकोश को क्रियारूप में प्रतिपादित किया गया है। (2) इनके इन कर्ता आदि के लिए उनकी योग्यता को ही आधार माना है। (3) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-४० सूक्ष्मशरीर बुद्धि+पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन+पञ्चज्ञानेन्द्रिय पञ्चकर्मेन्द्रिय+पञ्चप्राण विज्ञानमय कोश मनोमय कोश प्राणमय कोश शक्तिमान् इच्छाशक्तिमान् क्रियाशक्तिमान् कर्तृरूप करणरूप क्रियारूप अवतरणिका-तत्पश्चात् सम्पूर्ण चराचरजगत् के सूक्ष्मशरीरों में एकत्व की विवक्षा से समष्टिरूप एवं अलग-अलग कहने की दृष्टि से व्यष्टिरूप में क्रमशः जलाशय और जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान एकता का प्रतिपादन करते हैं- अत्राप्यखिलसूक्ष्मशरीरमेकबुद्धिविषयतया वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिरनेकबुद्धिविषयतया वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिरपि भवति। एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं सूत्रात्मा हिरण्यगर्भः प्राण श्चेत्युच्यते सर्वत्रानुस्यूतत्वाज्ज्ञानेच्छाक्रियाशक्तिमदुपहितत्वाच्च। अस्यैषा समष्टिः स्थूलप्रपञ्चापेक्षया सूक्ष्मत्वात्सूक्ष्मशरीरं विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासनामयत्वात्स्वप्नोऽत एव स्थूलप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते। एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं तैजसो भवति तेजोमयान्तःकरणोपहितत्वात्। अस्यापीयं व्यष्टिः स्थूलशरीरापेक्षया सूक्ष्मत्वादिति हेतोरेव सूक्ष्मशरीरं