विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५२ : विज्ञानभैरव मृतचेष्टस्य पिण्डस्य न किञ्चिदुपलभ्यते । सुखं दुःखं न चैवास्ति परमानन्दभावनात् ॥ जिज्ञासारहितं स्थानं यत्र देवो निरञ्जनः । अकालकलनाहेतुर्गमागमविवर्जितः ॥ निरालम्बो निरुत्साहः शून्यभूतः शिवः स्वयम् । संज्ञानाशेन निर्जीवसंज्ञा सा व्योमरूपिणी ॥ अर्थात् प्राण-पखेरु के उड़ जाने से जिसकी सारी चेष्टाएँ समाप्त हो गई हैं, ऐसे मृत शरीर को कुछ भी बोध नहीं होता, न तो उसको सुख का अनुभव होता है और न दुःख का ही, क्योंकि वह तो परम आनन्द की भावना में लीन हो गया है । वह उस जिज्ञासारहित स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ पर कि काल की कलना और आवागमन से रहित, निरालम्ब, निरुत्साह, शून्यस्वरूप, निरंजन देव शिव स्वयं निवास करते हैं । संज्ञा के नष्ट हो जाने पर शरीर निर्जीव हो जाता है, किन्तु इस दशा में वह आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । इसी प्रसंग में शिव ने देवी को यह भी कहा है— विचरामि न चैकाकी कदाचिच्छून्यरूपता । सर्वं सर्वमयश्चाहं तद् रमेऽहं त्वया सह ॥ कदाचिदीदृशं विश्वं दृश्यमेतदितीरितम् । अर्थात् मैं कभी अकेला नहीं रहता, तब भी कभी-कभी शून्य स्वरूप हो जाता हूँ । मैं सब कुछ हूँ । यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है । मैं जब तुम्हारे साथ विहार करता हूँ, तभी कदाचित् यह जगत् दृश्य के रूप में परिणत हो जाता है । देहपात के अनन्तर भी देह में आत्मा की स्थिति मानने के ही कारण जैमिनीय शाखा वाले अन्त्येष्टि संस्कार के समय निर्जीव पिण्ड में भी विष्णुसंबंधी २१ स्नानों का विधान करते हैं । ऐसा न मानने पर “अविनाशी वा अरेऽयमात्मा” (बृ० उ० ४।५।१४), “नित्यो नित्यानाम्” (क० उ० २।२।१३), “न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनञ्जयः” (यो० चू० उ० २६) इत्यादि वचन प्रामाणिक नहीं रह जायेंगे । इस लिये मृत्यु के उपरान्त भी भैरव शरीर निर्विकल्प अवस्था में विद्यमान रहता है, इस बात को मानने में कोई दोष नहीं प्रतीत होता । इस निर्विकल्प भैरवावस्था में नित्य प्रविष्ट होने से इस रहस्य मार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों के लिये तीर्थाटन आदि कर्मकाण्ड अनावश्यक हैं, इस बात को निम्न श्लोक में जयरथ ने भी कहा है— बहुलमहसि बोधे प्रोच्छलत्येकरूपे जननमरणभाषां कातराः कल्पयित्वा । अविदितपरमार्थस्तीर्थदेवालयादि- श्रयणमुपदिशन्तो हन्त ! नापत्रपन्ते ॥