विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ : विज्ञानभैरव में लीन बना रहता है, उसके चित्त में निस्तरंग (स्थिर) स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है, वह स्वयं साक्षात् भैरव बन जाता है, यह ध्रुव सत्य है ॥१३७॥ अजरामरतामेति सोऽणिमादिगुणैर्युतः¹। योगिनीनां प्रियो² देवि सर्वमेलापकाधिपः³ ॥१३८॥ जीवन्नपि विमुक्तोऽसौ कुर्वन्नपि न⁴ लिप्यते । हे देवि, स साधकः, उक्तधारणाभ्यासादार्ढ्येन अजरामरताम् एति प्राप्नोति, अणिमादिगुणैर्युतः सन् विज्ञानात्मकसोमपानाद् योगिनीनां ज्ञानक्रियानन्दादिशक्तीनां प्रियः सर्वमेलापकाधिपो भवति सकलस्यास्य वेद्यवेदकादिराशेः खिलीकृतस्वभावोऽत्यन्त- निर्मलचिद्वपुरद्वैतप्रकाशमयः परमात्मा भैरवः संपद्यत इति तात्पर्यार्थः । असौ स साधकः, जीवन्नपि विमुक्तो जीवन्मुक्त एव । पश्यन्नपि, शृण्वन्नपि, जिघ्रन्नपि इत्यादि चेष्टितं कुर्वन्नपि न लिप्यते । कर्माणि कुर्वन्नपि तत्फलैर्न लिप्यत इति भावः ॥१३८॥ श्रुति में देवताओं ने कहा है कि “सोमरस का पान कर हम अमर हो गये हैं”। जैसे देवगण सोमरस का पान कर अजर-अमर हो गये, उसी तरह से ऊपर बताई गई धारणाओं में दृढ़ अभ्यास से प्राप्त हुए विज्ञान रूपी सोमरस का पान कर योगी अजर और अमर हो जाता है। उसको अणिमा प्रभृति सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। वह ¹योगिनियों का, ज्ञान- क्रिया-आनन्द प्रभृति शक्तियों का स्वामी हो जाता है और सभी मेलापकों का अधिपति बन जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि वह योगी इस जगत् की सभी वेद्य (ज्ञेय) और वेदक (ज्ञापक) वस्तुओं को तिरस्कृत कर अत्यन्त निर्मल चिन्मय शरीर को धारण कर अद्वय, प्रकाश- मय परमात्मा, अर्थात् साक्षात् भैरव बन जाता है। इस प्रकार का साधक जीवन्मुक्त कहलाता है। वह देखना, सुनना, सूँघना, प्रभृति क्रियाकलापों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता, उनमें रस नहीं लेता। जैसा कि भगवान् ने गीता में कहा है— पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ।। प्रलपन् विसृजन् गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।.... ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ (५।८-१०) १. °णान्वितः-क० । २. प्रभुर्दे°-ख० । ३. °कारकः-ख० । ४. च चेष्टितम्-क० ।
- कौल मत में साधक को वीर अथवा सिद्ध और साधिका को योगिनी कहा जाता है। सिद्धों और योगिनियों के संघट्ट को मेलापक कहते हैं। ११२ प्रकार की धारणाओं में से किसी एक का भी सहारा लेकर योगी इस मेलापक का अधिपति हो जाता है, सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेता है, सिद्धों और योगिनियों का सारा समुदाय इसी के निर्देश के अनुसार चलता है। योगिनीप्रिय और मेलापकाधिप इन दो शब्दों का यही साम्प्रदायिक अर्थ है।