विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० : विज्ञानभैरव अर्थात् इन्द्रियों की बहिर्मुख प्रवृत्ति को रोक कर आन्तर अनाहत नाद की भावना करना ही जप कहलाता है, विकल्पात्मक नाना वर्णों के संघात से बने मन्त्रों का बाह्य उच्चा- रण वस्तुतः जप नहीं कहलाता । तन्त्रालोक में जप का स्वरूप यह बताया गया है— तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः । ( १।१९० ) जयरथ ने त्रिशिरोभैरव और विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत करते हुए इसकी व्याख्या यह की है कि उस शिव के परावाक् स्वभाव, अनाहत नादमय स्वरूप का बार-बार परामर्श करना ही जप कहलाता है। इसमें भाव और अभाव से निर्मुक्त, इन दोनों दशाओं के बीच में स्फुरित होने वाले संवित्स्वरूप का ही बोध होता है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० २६१-२६२ ) में अभिनवगुप्त ने यह शंका उठाई है कि शब्दों की आवृत्ति से ही तो जप की सिद्धि होती है, परावाग् स्वभाव अनाहत नाद का जप कैसे किया जा सकता है ? साथ ही वहीं इसका उत्तर भी दिया है कि जैसे स्वात्मस्वरूप एक बार ही प्रकाशित होता है, बार-बार उसके प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती, उसी तरह यह जप भी एक बार ही प्रत्यभिज्ञात होता है, अपनी प्राण शक्ति के इस स्वाभाविक व्यापार को एक बार पहचान लेने पर फिर बार-बार इसको पहचानने की आवश्यकता नहीं रह जाती । "कथा जपः” ( ३।३७ ) इस शिवसूत्र की विमर्शिनी में क्षेमराज ने इसी श्लोक के आधार पर जप की व्याख्या की है । हंस गायत्री के जप के विषय में आगे मूल में पुनः चर्चा आवेगी । तभी इस पर विस्तार से विचार किया जायगा ॥१४२॥ १ध्यानं २हि ३निश्चला ४बुद्धिर्नि ५राकारा निराश्रया । न तु ध्यानं शरी ६राक्षिमुखहस्तादिकल्पनां ॥१४३॥ निश्चला वेद्यावेद्यपतितापि समाधानबलान्निवातदीपवत् स्थिरा, निराकारा नानोल्लेखशून्या, 'निर्विकारा' इति पाठे विकारवर्जिता, निराश्रया कन्दहृदयद्वादशान्ता- द्याश्रयहीना च बुद्धिः ध्यानमिति कथ्यते । अत्र सूक्ष्मवस्तूपदेशके भैरवशास्त्रे सूक्ष्म- शरीरस्य कल्पनामयस्य भगवतः साकारस्वरूपस्य मुखहस्तादिकल्पना ध्यानपदेन नैव कदाचनाऽभिधीयते ॥१४३॥ निश्चल अर्थात् अत्यन्त स्थिर, निराकार अर्थात् भांति-भांति के आकारों की कल्पना से शून्य, अथवा विकारों से रहित, अर्थात् नाना प्रकार के परिणामों से मुक्त, निराश्रय अर्थात् मूलाधार, हृदय, द्वादशान्त आदि स्थानों का सहारा न लेने वाली बुद्धि ही इस शास्त्र १. या-यो० त० म० । २. निष्कला-यो० । ३. चिन्ता नि०-यो० म० । ४. ०वि०- ख० । ५. ०रस्य-यो० त०, ख०, ०रादि०-म० । ६. ०न्म म० । श्लोक संकेतपद्धति का प्रतीत होता है, जिसके कि कुछ श्लोक बाद में नित्याषोडशिकार्णव के पंचम पटल के अन्त में जोड़ दिये गये ।
- तन्त्रा० वि० ( भा० १, आ० १, पृ० १३४ ), योगिनी० ( पृ० १९६ ) और महार्थ० ( पृ० १२७ ) में यह श्लोक उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)