भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( १२ ) करती है। तन्त्र और योगशास्त्र के सभी पाठक षट्चक्रों और उनमें विद्यमान वर्णों की स्थिति से परिचित हैं। पूर्णानन्द के षट्चक्रनिरूपण में और सौन्दर्यलहरी की लक्ष्मीधरा टीका में इनका विशद विवेचन मिलता है। नाडीचक्र प्रभृति षट्चक्रों का निरूपण नेत्रतन्त्र (७।२८-२९) में भी है। किन्तु विज्ञानभैरव में इनकी कोई चर्चा नहीं है। इनके स्थान पर यहाँ बारह चक्रों या क्रमों की चर्चा आई है। इस विषय पर आगे विचार किया जायगा। इन चक्रों की मूलाधार या हृदय से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त भावना की जाती है। मूलाधार में जैसे कुण्डलिनी का निवास है, उसी तरह से हृदय में भी सार्धत्रिवलया प्राण- कुण्डलिनी रहती है। मध्यनाडी सुषुम्णा के भीतर चिदाकाश (बोधगगन) रूप शून्य का निवास है। उससे प्राणशक्ति निकलती है। इसी को अनच्क कला भी कहते हैं। इसमें अनच्क (अच् = स्वर से रहित) हकार का निरन्तर नदन होता रहता है। यह नादभैरव की उन्मेष दशा है, जिससे कि प्राणकुण्डलिनी की गति ऊर्ध्वोन्मुख होती है, जो श्वास-प्रश्वास, प्राण-अपान की गति की भी कारण स्वरूप है और जहाँ इनकी एकता का अनुसन्धान किया जा सकता है। मध्यनाडी स्थित बिना क्रम के स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाली यह प्राणशक्ति ही अनच्क कला कहलाती है। अजपा जप में इसी का स्फुरण होता है। प्राण और अपान व्यापार से भिन्न, श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से अलग, स्वाभाविक रूप से निरन्तर चल रहे प्राण (हृदय) के स्पन्दन व्यापार (धड़कन) को ही यहाँ अनच्क कला कहा गया है। स्पन्दकारिका में प्रति- पादित स्पन्द तत्त्व यही है। वामननाथ ने भी इसका वर्णन किया है। (पृ० १०१)। नेत्रतन्त्र (सप्तम अधिकार) में सूक्ष्म उपाय के प्रसंग में प्राण-चार के नाम से इसकी व्याख्या की गई है। इस तरह से सातवें प्रश्न का अभिप्राय यह है कि क्या परम तत्त्व का स्वरूप मूलाधार या हृदय में स्थित कुण्डलिनी शक्ति से अभिन्न है ? ८. शक्तिस्वरूप आठवाँ और अन्तिम प्रश्न है कि क्या यह तत्त्व शक्तिस्वरूप है ? शिवदृष्टि की टीका (पृ० ९४) में उत्पल ने शक्तिपारम्यवादी स्वयूथ्य (अपने गोल के) संप्रदाय का उल्लेख किया है। उनके मत से संवित्स्वरूपा शक्ति ही परम तत्त्व है। इस संप्रदाय में यह परम शक्ति ही शिव को शास्त्रों का उपदेश करती है। १ क्रमदर्शन में शक्ति को ही परम तत्त्व माना गया है। क्रमदर्शन के आगम ग्रन्थ शक्ति के द्वारा शिव को उपदिष्ट हैं। प्रस्तुत अन्तिम प्रश्न में इसी शक्ति के संबन्ध में पूछा गया है कि क्या यही परम तत्त्व है। ऊपर शक्ति के परा, परापरा और अपरा ये तीन भेद बताये गये हैं। इनके संबन्ध १. शाक्त उपाय के प्रतिपादक शास्त्र को क्रम दर्शन कहा गया है। अनेक स्थानों पर इसकी चर्चा हो चुकी है। ७६ वें श्लोक की व्याख्या में इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। ५३-५८ धारणाएँ क्रम दर्शन का अनुवर्तन करती हैं।