विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४५ ) प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल महामहिम मरि डॉ० चेन्ना रेड्डी महोदय की असीम अनुकम्पा से इस दुःस्थिति का अन्त हो सका। अतः यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित किया जा रहा है। इस प्रसंग में मैं अपने परिवार को और सहधर्मिणी सौ० सुशीला द्विवेदी को भी नहीं भुला सकता, जिन्होंने कि रुग्ण रहते हुए भी बड़े धैर्य और शालीनता के साथ इस दुःस्थिति का सामना किया। इनके कारण ही मैं परिवार के दैनन्दिन उत्तरदायित्व से मुक्ति पाकर भगवती सर- स्वती की आराधना के लिये पर्याप्त समय निकाल पाता हूं। अनेक भारतीय लिपियों के विशेषज्ञ और सरस्वतीभवन पुस्तकालय के वरिष्ठ सदस्य पं० श्रीजनार्दन शास्त्री पाण्डेय एवं मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था की वाराणसी शाखा के व्यवस्थापक श्रीनरेन्द्रकुमार जैन के परामर्श से इस ग्रन्थ के अनुवाद कार्य का श्रीगणेश किया गया था और भारतीय दर्शन एवं संगीत के प्रसिद्ध विद्वान् ठाकुर श्रीजयदेवसिंहजी ने इस अनुवाद को सराहा और साथ में अनुवाद को टिप्पणियों से सुसज्जित करने का बहुमूल्य परा- मर्श दिया था। हिन्दी के माने हुए विद्वान् श्रीकृष्णशंकर शुक्ल ने ग्रन्थ के पूरे हिन्दी अनुवाद को धैर्यपूर्वक सुनकर उसमें यथोचित संशोधन प्रस्तुत किये थे और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व- विद्यालय के आगमशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् श्रीरघुनाथ मिश्र ने सम्पूर्ण उपोद्घात को मनो- योगपूर्वक पढ़कर आवश्यक परिवर्तन एवं संशोधन सुझाये हैं। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्या- लय के बौद्ध दर्शन विभाग के प्राध्यापक नवाचार्य श्रीलक्ष्मण त्रिवेदी, सरस्वतीभवन पुस्तका- लय के मुद्रित विभाग के वरिष्ठ सदस्य श्रीजानकीप्रसाद शर्मा और पं० श्रीहरिवंश त्रिपाठी ने भी इस कार्य में यथोचित सहयोग किया है। गोयनका विश्वनाथ पुस्तकालय के अध्यक्ष श्रीदेवमणि याज्ञिक ने संबद्ध पुस्तकों के अभाव की प्रतीति कभी नहीं होने दी। इन सब महा- नुभावों के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष श्रीसुन्दरलाल जैन के सहयोग से ही यह पुस्तक पाठकों तक पहुंच रही है। इसके त्वरित मुद्रण में काशी के महावीर प्रेस के व्यवस्थापक श्रीबाबूलाल जैन 'फागुल्ल' ने सराहनीय सहयोग किया है। इनके प्रति भी यह लेखक कृतज्ञता-ज्ञापन करता है। श्लोकार्ध-सूची और शब्द-सूची तैयार करने में सहायता करनेवाली अपनी पुत्री कु० करुणा द्विवेदी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ। हमने यहाँ कुछ विषयों पर अपने विचार प्रकट करने की धृष्टता की है। उनकी साधुता-असाधुता का निर्णय तो मनीषीगण ही कर सकते हैं। स्खलन और त्रुटियाँ मनुष्य के स्वभाव के साथ लगी हुई हैं। भट्ट कुमारिल के शब्दों में 'समादधति सज्जनाः' कह कर हम इस उपोद्घात को पूरा करते हैं। गीता जयन्ती, सं० २०३४ विद्वद्वशंवद— दि० २१-१२-७७ व्रजवल्लभ द्विवेदी