विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय संस्करण इस ग्रन्थ का पहला संस्करण सन् १९७७ के बीतते-बीतते प्रकाशित हुआ था । यह प्रसन्नता की बात है कि अब १९८३ के बीतते-बीतते इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हो रहा है । किसी परीक्षा का पाठ्यग्रन्थ न रहते हुए भी अथवा उपन्यास एवं कथा साहित्य जैसी मनोरंजक सामग्री के न रहने पर भी ६ वर्ष की स्वल्प अवधि में इसका यह दूसरा संस्करण प्रकाशक की ओर से प्रस्तुत किया जा रहा है, अपने आप में यह एक घटना है । इससे पाठकों की योग और अध्यात्म सम्बन्धी रुझान का पता चलता है । आशा है कि इस द्वितीय संस्करण का भी पाठक उसी उत्साह से स्वागत करेंगे । इस ग्रन्थ को एक तरफ मध्यप्रदेश के एक बाबा का श्राप मिला है और दूसरी तरफ गणेशपुरी के सन्त स्वामी मुक्तानन्द जी महाराज का प्रसाद । दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि अब वे स्थूल रूप में हमारे सामने नहीं रहे । निग्रह और अनुग्रह दोनों भगवान् भैरव के ही व्यापार हैं । गणेशपुरी आश्रम के एक वाक्य की ओर मैं पाठकों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ । वह वाक्य है—परस्परदेवो भव । प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रतिपादित विश्वाहन्ता दृष्टि के विकास की कुञ्जी इस वाक्य में छिपी-सी प्रतीत होती है । इस विषय पर गहन मनन करने की आवश्यकता है । इस ग्रन्थ के एक समालोचक का कहना है कि गांधीवादी दर्शन दिग्भ्रान्त नहीं है, देशवासी दिग्भ्रान्त हैं और उसके अनेक कारण हैं । कौन दिग्भ्रान्त है, इसका निर्णय पाठकों पर ही छोड़ा जा रहा है । इस संस्करण में टिप्पणी आदि में यत्र-तत्र किये गये सामान्य संशोधनों के अतिरिक्त कोई विशेष परिवर्तन-परिवर्धन नहीं किये गये हैं और न उस प्रकार के सुझाव ही हमारे पास आये हैं । प्रबुद्ध पाठकों के द्वारा भेजे गये सुझावों का हम सदा स्वागत करेंगे और आवश्य- कता के अनुसार तदनुरूप सामग्री का अगले संस्करणों में साभार समावेश करने का प्रयत्न करेंगे । पौष कृष्ण ६, वि० २०४० विद्वद्वशंवद— बड़ा दिन (२५-१२-८३) व्रजवल्लभ द्विवेदी