भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरवः

श्रीभैरवी¹ उवाच श्रुतं देव मया सर्वं ²रुद्रयामलसंभवम् । त्रिकभेदमशेषेण सारात्सारविभागशः ॥१॥ अद्यापि न निवृत्तो मे संशयः परमेश्वर । अन्वयार्था हे देव, मया रुद्रतच्छक्तिसामरस्यात्मनो यामलात् संभूतं सर्वं त्रिकभेदम् अशेषेण सामस्त्येन सारात्सारविभागशः श्रुतम्। वेदादिशास्त्रेषु त्रिकशास्त्रं सारम्, तत्रापि सिद्धा-मालिनी-¹उत्तरशास्त्राणि क्रमश उत्कृष्टानि सारात्सारपदाभिधेयानि विभागशो मया श्रुतानि। तथापि हे परमेश्वर ! नाद्यापि मे संशयः शान्तः। 'यामलादिषु भाषितम्' इति पाठे यामलादिषु शिवशक्तिसंघट्टनात्महेतुषु ब्रह्मविष्णुरुद्रभैरवादियामलेषु तदाख्येषु आगमेषु यत्किञ्चिदुक्तमित्यर्थः ॥१॥ रहस्यार्थ अनुबन्ध-चतुष्टय शास्त्रीय ग्रन्थों के टीकाकारों की यह परम्परा रही है कि प्रारंभ में व्याख्येय ग्रन्थ के अनुबन्ध-चतुष्टय का स्पष्ट लेखा-जोखा रखा जाय । विषय, प्रयोजन, संबन्ध और अधिकारी ये अनुबन्ध-चतुष्टय कहलाते हैं। ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय क्या है ? इसके अध्ययन से किस १. देवी-क० । २. यामलादिषु भाषितम्-ख० ।

  1. तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (१।१८; पृ० ४९) त्रिकशास्त्र को सिद्धा, नामक और मालिनी नाम के तीन खण्डों में विभक्त किया है। इनमें क्रिया-प्रधान तन्त्र को सिद्धा और ज्ञान-प्रधान तन्त्र को नामक बताया गया है। मालिनीमत में क्रिया और ज्ञान दोनों प्रतिपादित हैं। अभिनवगुप्त ने स्वयं "तत्सारं त्रिकशास्त्रं हि तत्सारं मालिनीमतम्" (१।१८) ऐसा कह कर इनमें मालिनीमत को प्रधानता दी है। क्षेमराज अपने विज्ञानो- द्योत (पृ० ४) में सिद्धा, मालिनी और उत्तर यह नाम देकर इनका उत्तरोत्तर उत्कर्ष बताते हैं। नामक नाम का कोई तन्त्र हमारी दृष्टि में नहीं आया। क्षेमराज के 'उत्तर' नाम को देख कर ऐसी कल्पना करने की इच्छा होती है कि जयरथ के ग्रन्थ में 'नामक' न होकर 'वामक' पाठ होना चाहिये। वाम तन्त्र शिव के उत्तर मुख से उद्भूत माने जाते हैं। क्या 'वामक' नाम से वामकेश्वर तन्त्र का ग्रहण किया जाय ?
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