भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ९ किं रूपं तत्त्वतो देव शब्दराशिकलाम१यम् ॥२॥ किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ । त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ॥३॥ नादबिन्दुमयं वाऽपि किं चन्द्रार्धनिरोधिकाः२ । चक्रारूढमनच्चकं वा किं वा शक्तिस्वरूपकम् ॥४॥ हे देव, भैरवाकृतौ भैरवभट्टारके तत्त्वदृष्ट्या किं रूपम् ? किमस्य बोधभैरवस्य शब्दराशिकलामयं स्वरूपम् ? किं वा नवतत्त्वात्मतया नववामादिशक्तिस्वरूपतया वा प्रथितं तत् ? त्रिशिरोभैरवरूपेण भिन्नं वा ? किं वा शक्तित्रयात्मकम् ? अथवा नाद- बिन्दुमयं ? अर्ध चन्द्रनिरोधिकादिरूपं वा तत् ? चक्रारूढमनच्चकं वा तस्य स्वरूपम् ? अथवा शक्तिस्वरूपमेव तद् भैरवस्वरूपमिति तत्सर्वं वद ॥२-४॥ यहाँ भगवती भैरवी पूर्व अभ्यस्त अनेक शास्त्रों के आधार पर निम्न विकल्पों की उद्भावना इस अभिप्राय से करती है कि अन्ततः परम तत्त्व के वास्तविक स्वरूप का सही ज्ञान प्राप्त हो सके । वह पूछती है कि उस अनुत्तर तत्त्व का वास्तव में स्वरूप क्या है ? उसका पहला प्रश्न है कि भयानक आकृति वाले, संसार की घटना करने में समर्थ भैरव भट्टारक का, क्या अकार से ले कर क्षकार पर्यन्त शब्दराशि की कलाएँ—अनुत्तर१, आनन्द, इच्छा प्रभृति विमर्श शक्तियां ही, जिन्होंने कि वाच्य और वाचक स्वरूप से जगत् के सारे विस्तार को अपने में समेट रखा है, वास्तविक स्वरूप है ? क्योंकि बोध-भैरव सदा विमर्श शक्ति से युक्त रहता है । अनुत्तर अकार प्रकाशात्मक शिव का और हकार विमर्शात्मक शक्ति का प्रतीक माना जाता है । इन्हीं के संयोग से 'अहम्' इस सामरस्य स्वरूप की निष्पत्ति होती है, जिसमें कि पाणिनि के२ प्रत्याहारों की तरह समस्त वर्णों की स्थिति मानी गई है । इस १. ॰त्मक॰-ख० । २. ॰धकम्-ख० ।

  1. शब्दब्रह्म की अनुत्तर प्रभृति विमर्श-शक्तियों का विकास-क्रम तन्त्रालोक तृतीय आह्निक, सौभाग्यसुधोदय प्रथम प्रपंच और परापंचाशिका प्रभृति ग्रन्थों में विस्तार से वर्णित है । इस विषय को शिवसूत्रविमर्शिनी के द्वितीय उन्मेष की ५२-५५ संख्या की टिप्पणियों में संक्षेप में समझाया गया है । वहाँ यह भी बताया गया है कि वाच्यवाचकभावमय षडध्व- स्वरूप सारा विश्व अनुत्तर तत्त्व अकार में ही निवास करता है ।
  2. पाणिनि की अष्टाध्यायी के प्रारंभ में पठित 'अइउण्' प्रभृति चौदह शिवसूत्रों को प्रत्याहार सूत्र भी कहा जाता है । इनसे अण्, अक्, अच् प्रभृति ४४ प्रत्याहारों की रचना की जाती है । इसकी विधि 'आदिरन्त्येन सहेता' इस पाणिनि सूत्र में बताई गई है । तदनुसार उक्त चौदह सूत्रों के अन्तिम हल् वर्ण के साथ उसके पहले के किसी वर्ण को पकड़ कर इन प्रत्याहारों की रचना की जाती है । यह उसके मध्य में पठित वर्णों का और स्वयं अपना भी बोधक होता है । जैसे कि अण् प्रत्याहार से मध्य में पठित इ