विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ : विज्ञानभैरव अन्तर्मुख हो जाती है। तब ऐसी प्रतीति होती है मानों प्राण और अपान कहीं विलीन हो गये हैं। इस स्थिति को इस शास्त्र में 'मध्यदशा' के नाम से जाना गया है, जिसका कि विश्लेषण आगे किया जा रहा है। इस मध्यदशा का जब विकास किया जाता है, तब परा शक्ति भैरवी से अभिन्न रूप में विद्यमान भगवान् भैरव का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। धर्म और धर्मी के रूप में प्रकाश और विमर्श स्वभाव शिव और शक्ति भिन्न होते हुए भी परमार्थतः एक ही हैं, इसका विवेचन अभी यहीं (१४-२१ श्लोक) किया जा चुका है। 'अनिवर्तनात्' के स्थान पर 'अनुवर्तनात्' ऐसा पाठ भी उपलब्ध होता है। यहाँ अनुवर्तन शब्द का अर्थ प्राण और अपान की उन्मेष और निमेष दशा की स्थिर अनुवृत्ति है। अर्थात् प्राण और अपान की जो स्थिति है, उसी के अनुवृत्त रहने पर, उनमें नये उन्मेष और निमेष व्यापार के न चलने पर, पहली व्याख्या में प्रतिपादित मध्यदशा का अन्वेषण किया जा सकता है। योगशास्त्र¹ की प्रक्रिया के अनुसार इस श्लोक का अभिप्राय यह होगा—सकल², प्रलयाकल प्रभृति सभी प्रमाता जीवों के प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभा- विक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं। हृदय स्थित कमलकोश से प्राण का उदय होता है। नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चल कर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है। इसलिए बाह्य आकाश भी योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। प्राण की इस स्वाभाविक बाह्य गति को 'रेचक' नाम से जाना जाता है। बाह्य द्वादशान्त से अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमल- कोश में विलीन हो जाता है। अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति 'पूरक' कही जाती है। प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षणमात्र के लिये विलीन हो जाता है। यही प्राण की १. शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की व्याख्या, विशेष कर आठ प्रकार के प्राणायामों का विवेचन योगवासिष्ठ के आधार पर किया है। योगवासिष्ठ 'मोक्षोपाय' के नाम से भी प्रसिद्ध है। द्रष्टव्य—प्रकरण ६ पूर्वार्ध, २५ वां सर्ग। २. शैव शास्त्रों में प्रमाता के सात भेद माने गये हैं। ये हैं—शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल। शिव और शक्ति तत्त्व मिलकर शिव प्रमाता का रूप धारण करते हैं। इसकी स्थिति राजा के समान है। सदाशिव मन्त्रमहेश्वर, ईश्वर मन्त्रेश्वर और शुद्धविद्या मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी स्थिति अधिकारी राजपुरुष की सी है। विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल जीवों पर ये शिवप्रमाता रूपी राजा के प्रतिनिधि होकर शासन करते हैं। आणव, मायीय और कार्म—ये तीन प्रकार के मल माने गये हैं। इनमें से एक मल से आवृत विज्ञानाकल, दो मलों से आवृत प्रलयाकल और तीनों मलों से आवृत सकल प्रमाता कहलाते हैं। ये सभी भेद परिमित प्रमाता के हैं। प्रथम चार भेद शुद्ध सृष्टि के और अन्तिम तीन अशुद्ध सृष्टि के अन्तर्गत हैं। अशुद्ध सृष्टि के प्रमाताओं को ही अपने मलीय आवरणों को हटाने के लिए उपायों का सहारा लेना पड़ता है।