विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० : विज्ञानभैरव में निरन्तर लगा रहता है। जैसे कि १. उदय के बिना अपान की अन्तर्मुखता बाह्य रेचक के नाम से जानी जाती है। २. अपान के द्वादशान्त से उठ कर स्थूल स्वरूप धारण करने की दशा को बाह्य पूरक कहा जाता है। ३. इसी तरह से द्वादशान्त (बाह्य आकाश) से उठ कर नासिका के अग्रभाग तक की अपान की गति को भी बाह्य पूरक कहा जाता है। ४. बाह्य आकाश (द्वादशान्त) में प्राण के अस्त हो जाने पर जब तक अपान का उदय नहीं हो जाता, तब तक की अवस्था को बाह्य कुम्भक कहा जाता है। अपान की उस समय वैसी ही स्थिति रहती है, जैसी कि मिट्टी में अभी पैदा नहीं हुए घड़े की होती है। इस तरह से प्राण और अपान के पूरण के दो प्रकारों के अनुसार प्राणायाम के आठ भेद होते हैं। इन सभी आठों प्राणायामों को अपना ही स्वरूप समझ कर इनकी भावना करनी चाहिये। हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में प्राण की गति रहती है और हृदय-कमल, मुख का संकोच-विकास तथा द्वादशान्त अपान की गति के स्थान हैं। इनमें एक क्षण के लिये प्राण के अस्त हो जाने पर और अपान का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के बाह्य कुम्भक की प्राप्ति होती है। इसी तरह से एक क्षण के लिये अपान के अस्त हो जाने पर और प्राण का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के अन्तः कुम्भक की प्राप्ति होती है। यह 1मध्यदशा ही परम पद कहलाती है। प्राण और अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान सकते हैं। एक 2त्रुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्य- और 'प्रश्वास' सांस लेने को कहते हैं। लेकिन सूत्र की अर्थकथा में दिया हुआ अर्थ इसका ठीक उल्टा है। आचार्य बुद्धघोष विनय की अर्थकथा का अनुसरण करते हैं। उनका कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर जाती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है। इस प्रवृत्ति क्रम से 'आश्वास' वह वायु है, जिसका निःसारण होता है। सूत्र की अर्थकथा में किया गया अर्थ पातंजल योगसूत्र के व्यास-भाष्य के अनुसार है (२।४९ पर व्यासभाष्य- “बाह्यस्थवायोरानयनं (चमनं) श्वासः, कोष्ठ्यस्य वायोर्निःसारणं प्रश्वासः)'' (पृ० ८१)। ६६ वें श्लोक की व्याख्या में भी इस तरह का मतभेद देखने में आता है। इस पर उपोद्घात में विचार किया जायगा।
- “मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः” और “विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकास-वाहच्छेदद्यन्त- कोटिनिभालनादय इहोपायाः” (सू० १७-१८) प्रत्यभिज्ञाहृदय के इन दो सूत्रों और उनकी व्याख्या में क्षेमराज ने इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाया है।
- प्राण के सवा दो अंगुल चलने में जितना समय लगता हैं, उसे 'त्रुटि' कहते हैं। कमल के कोमल पत्तों में तीखी सुई चुभोने पर एक पत्ते को छेदने में जो समय लगता है, उसे 'लव' कहा जाता है। अठारह निमेष (पलक झपने का समय) की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला और तीस कला का एक क्षण होता है। त्रुटि, लव और क्षण की यह परिभाषा क्रमशः तन्त्रसार (अभिनवगुप्त कृत, पृ० ४८), प्रपंचसार (१।३९) और अमर- कोश (१।४।११) में दी गई है।