विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ : विज्ञानभैरव इसका अभिप्राय यह है कि प्राण और अपान की गति को रोक कर मध्यदशा का विकास कर उससे उत्पन्न शक्ति की सहायता से ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश पाकर योगी परम प्रकाश- मय स्थिति में अवस्थित हो जाता है ॥२९॥ [ धारणा-७ ] क्रमद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वा¹ऽन्ततः शिवः ॥३०॥ जन्माग्र-मूल-कन्द-नाभि-हृत् - कण्ठ-तालु-भ्रूमध्य - ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापि- न्याख्यं यत्क्रमाणां चक्राणां द्वादशकं द्वादशस्थाननामभिः प्रसिद्धम्, तत् सम्यगिति यथा- यथं क्रमेण अकारादिविसर्गान्तैः षण्ढस्वरवर्जैर्द्वादशाक्षरैः, भेदितं रञ्जितम्, ध्यायेदिति शेषः । तच्च प्रत्येकं स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या आदौ ध्यानेन स्फुटं ततश्च स्पन्दमानं ततोऽपि ज्योतीरूपतां प्राप्तं स्थूलं सूक्ष्मं परमित्यभिधीयते । इति सोपानपदक्रमं मुक्त्वा मुक्त्वा परित्यज्य, अन्ततोऽन्ते, शिवः परमार्थतः सर्वत्रावभासकः स्वात्मस्वरूपः शिव एव भवति ॥३०॥ जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति, व्यापिनी ये बारह चक्र, जो कि द्वादश स्थान के नाम से प्रसिद्ध हैं, क्रमशः एक दूसरे के ऊर्ध्व स्थान में स्थित हैं । इन चक्रों के स्थान और स्वरूप को ठीक तरह से समझ कर उनमें अकार से लेकर विसर्ग पर्यन्त स्वरों का ध्यान करना चाहिये । तन्त्रशास्त्र में ऋ ॠ लृ लॄ ये चार स्वर षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं, अतः ध्यान आदि में इनका उपयोग नहीं किया जाता । सोलह स्वरों में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने पर इनकी संख्या भी बारह रह जाती है । अतः इन बारह स्वरों का क्रमशः उक्त बारह चक्र स्थानों में ध्यान करना चाहिये । यह ध्यान स्थूल, सूक्ष्म और पर पद्धति से त्रिविध¹ उपाय के रूप में मृत्युंजयभट्टारक (नेत्रतन्त्र) के ६-८ अधि- कारों में विस्तार से वर्णित है । योगी जब अपने दृढ़ संकल्प से इन ध्यानों का अभ्यास करते हुए स्पष्ट स्थूल वस्तु के ध्यान को छोड़ कर स्पन्दावस्था में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु के ध्यान में और सूक्ष्म ध्यान को छोड़कर ज्योतिर्मय पर वस्तु के ध्यान में प्रविष्ट होता है, तो अन्ततः इस अभ्यास-पद्धति से वह परमार्थ रूप से सर्वत्र प्रकाशित हो रहे कल्याणमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, अर्थात् स्वयं शिव बन जाता है ॥३०॥ [ धारणा-८ ] तया²ऽऽपूर्याशु मूर्धान्तं भङ्क्त्वा भ्रूक्षेपसेतुना । निर्विकल्पं मनः कृत्वा सर्वोर्ध्वे सर्वगोद्गमः ॥३१॥ १. ˚क्त्वा त˚-ख० । २. ˚था˚-ख० ।
- याग, होम, जप, ध्यान, मुद्रा, यन्त्र, मन्त्र—ये सब स्थूल उपाय हैं । षट्चक्र, षोडश आधार आदि में प्राण-चार की भावना को सूक्ष्म उपाय बताया गया है । अष्टांग योग के अभ्यास से प्राप्त होने वाली सर्वात्मभाव की स्थिति को पर उपाय माना गया है ।