विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १५१ ७१ ) ऐसेहुँ साहब की सेवा सों होत चोर रे । अपनी न बूझ, न कहै को राँडरार रे ॥१॥ मुनि-मन-अगम, सुगम माइ-बापु सो। कृपासिन्धु, सहज सखा, सनेही आपु सो ॥२॥ लोक-वेद-विदित बड़ो न रघुनाथ सो। सब दिन सब देस, सबहि के साथ सो ॥३॥ स्वामी सर्वग्य सों चलै न चोरी चार की। प्रीति पहिचानि यह रीति दरवार की ॥४॥ काय न कलेस-लेस, लेत मानि मन की। सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जन की ॥५॥ रीझे बस होत, खीझे देत निज धाम रे। फलत सकल फल कामतरु-नाम रे ॥६॥ बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखै काम रे। सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥७॥ शब्दार्थ—राँडरौर = राँड़ोंकी आवाज। चार = सेवक, दूत। जोगवत = बचाते हैं, रखते हैं। खीझे = नाराज होनेपर। निवाज्यो = निहाल किया। भावार्थ—रे मन ! तू ऐसे भी स्वामीकी सेवा करनेसे जी चुरा रहा है! न तो तुझमें अपना हित पहचाननेकी समझ है और न किसीके कहनेका ही तुझपर कुछ असर पड़ता है। तू बिलकुल ही निकम्मा है ॥१॥ वह मुनियोंके मनके लिए भी अगम और भक्तोंके लिए माँ-बापकी तरह सुगम हैं। वह कृपाके समुद्र हैं, सहज सखा हैं और स्वभावतः स्नेही हैं ॥२॥ लोक और वेदमें यह बात प्रकट है कि रघुनाथजीसे बड़ा कोई नहीं है। वह सर्वदा (भूत, वर्तमान, भविष्य) सर्वत्र (स्वर्ग और नरक) और सबके साथ रहते हैं ॥३॥ सर्वज्ञ स्वामीसे सेवककी चोरी नहीं चलती। उनके दरबारकी यह रीति है कि केवल प्रेमकी ही पहचान की जाती है ॥४॥ उनकी सेवामें शरीरको रंचमात्र भी क्लेश नहीं होता। वह मनकी भावनाको ही मान लेते हैं। स्मरण करनेपर वह ससंकोच भक्तोंकी रुचि रखते हैं। सारांश, भक्तकी रुचिके अनुसार बड़ीसे बड़ी वस्तु दे डालनेपर भी