भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 163

१५२ विनय-पत्रिका संकोच करते हैं कि कुछ नहीं दिया ॥५॥ वह रीझनेपर वशीभूत हो जाते हैं (जैसे हनुमान्जीपर रीझकर उनके वशीभूत हुए थे) और खीझनेपर मुक्ति (निज धाम) देते हैं (जैसे रावण, बालि आदिको)। कल्पवृक्ष-सदृश जो राम-नाम है, वह सब फल फलता है ॥६॥ जिसे (तुलसीदासको) न तो बेचनेपर फूटी कौड़ी मिल सकती है और न रखनेसे कोई काम ही निकल सकता है, उस तुलसीदासको भी निहाल कर दिया—ऐसे महाराज रामचन्द्रजी हैं ॥७॥ विशेष १—'मुनि-मन.......बापु सो'—श्रीरामजी अगम भी हैं और सुगम भी। अगम तो ऐसे हैं कि मुनियोंके ध्यानमें भी नहीं आते, और सुगम भी इस कदर हैं कि अवधवासियों और ब्रजवासियोंको हर समय दर्शन दिया करते हैं। जैसे माता-पिता अपने बच्चोंकी शुश्रूषा करनेमें सदैव लगे रहते हैं, उसी प्रकार भगवान् भी अपने भक्तोंके पीछे-पीछे रहा करते हैं। २—'सनेही आपु सो'--वह किसी भी समयमें किसी जीवको नहीं भूलते। गर्भ सरीखे निषिद्ध स्थानमें भी परमात्मा प्रत्येक प्राणीका पालन करते हैं। ३—'सकल फल'—कल्पवृक्ष तीन फल देता है, पर राम-नाम चारों फल। इसीसे 'सकल फल' लिखा गया है। ७२ ) मेरो भलो कियो राम आपनी भलाई। हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक हित साईं ॥१॥ राम सों बड़ो है कौन, मो सों कौन छोटो। राम सों खरो है कौन, मो सों कौन खोटो ॥२॥ लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावों। एतो बड़ो अपराध भो न मन बावों ॥३॥ पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यों नीचो। बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो ॥४॥ शब्दार्थ—द्रोही = शत्रु। पै = पर। भो = हुआ। बावों = बाम, टेढ़ा। पाथ = जल।