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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariAwadhipublished475 pages

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विनय-पत्रिका १५

आप विपत्तियोंको हरनेवाले हैं। आप अज्ञानरूपी चूहेका नाश करनेवाले बिलाव हैं; संसारका भय हरनेवाले हैं; संसारके जीवोंको तारनेवाले और स्वयं मुक्त- स्वरूप तथा अभयदान करनेवाले हैं ॥१॥ आपके बलकी तुलना नहीं की जा सकती। आपका अत्यन्त विशाल गौर शरीर बहुत निर्मल है और उसकी उज्ज्वलता हिमालय पर्वतकी कान्तिके समान है। सिरपर पीले रंगका सुन्दर जटाजूट सुशोभित है जिसकी आभा करोड़ों बिजलियोंकी राशिके समान है ॥२॥ मस्तकपर मालाके समान गंगाजीका परम पवित्र जल विराजमान है, जिसकी शोभा ही विचित्र है। आपके सुन्दर ललाटपर निशानाथ चन्द्रमाकी कला शोभित है। ऐसे कुबेरके मित्र शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य आपके नेत्र हैं; आप कामदेवको जला चुके हैं; आप गुणोंके भण्डार हैं और ज्ञान-विज्ञानस्वरूप हैं। हे गिरिजा-रमण, आपका भवन कैलास-पर्वत है; आप सदैव कानोंमें कुण्डल धारण किये रहते हैं; आपके मुखकी छवि अनुपम है ॥४॥ आप अपने हाथमें ढाल, तलवार, शूल, डमरू, बाण और धनुष धारण किये रहते हैं। नन्दी नामक बैल आपकी सवारी है और आप करुणाके भण्डार हैं। (करुणा-निधान होनेके कारण ही आपने) विषकी अजेय ज्वालासे देव-दैत्य और मनुष्यलोकको जलते हुए तथा शोकमें व्याकुल देखकर उसे पान कर लिया था,—ऐसे आप कोमल चित्तवाले हैं ॥५॥ भस्म ही आपके शरीरका आभूषण है, बाघका चमड़ा ही वस्त्र है; आप अपने हृदयपर सर्पों और नरमुण्डोंकी माला धारण किये हुए हैं। डाकिनी, शाकिनी, खेचर, भूचर तथा यन्त्र-मन्त्रका आप नाश करनेवाले हैं। बड़े-बड़े पापोंके तो आप शत्रु हैं ॥६॥ आप कालके महाकाल हैं, कलिकालरूपी सर्पको भक्षण करनेके लिए गरुड़ हैं। आप त्रिपुरासुरको मारनेवाले तथा बड़े-बड़े भयंकर कर्म करनेवाले हैं। आप सब लोकोंके नाशक, तथा महाप्रलयके समय अपने त्रिशूलकी नोकसे दिशारूपी हाथियोंको छेदकर निर्गुणरूपसे नृत्य करनेवाले हैं ॥७॥ इस पाप-सन्तापसे परिपूर्ण भयानक संसारकी चौरासी लाख योनियोंमें मैं दीन होकर भ्रमण कर रहा हूँ, मेरी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हे भैरवरूप ! हे रामरूपी रुद्र ! मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि मेरे बन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता आप ही हैं ॥८॥ निर्मल बुद्धिवाली सरस्वती, वेद और नारदके समान प्रधान ब्रह्मचारी