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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariAwadhipublished475 pages

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१६ विनय-पत्रिका तथा शेषनाग जिनकी गुणावलीका वर्णन करते हैं, ऐसे सर्वेश्वर, आनन्दवन (काशी) में विराजमान भयको हरनेवाले शिवजीको तुलसीदास प्रणाम करता है ॥९॥ विशेष १—शिवजीका भैरवरूप चतुर्भुजी कहा गया है कालिकापुराणके ६० वें अध्यायमें लिखा है— भैरवः पाण्डुनाथश्च रक्तगौरश्चतुर्भुजः। किन्तु यहाँ गोस्वामीजीने उस रूपका वर्णन न करके किसी और ही रूपका वर्णन किया है,। २—धरणीधराभं—का अर्थ 'शेषनागकी कान्तिके समान' भी किया जा सकता है। ३—'भैरवरूप रामरूपी रुद्र'—कहनेका आशय यह है कि भैरवरूपसे संसारका भय दूर कीजिये और रामरूपसे मुझे अपनाइये। दनुज-वधके समय भगवान्‌का रुद्ररूप था। ( १२ ) संकरं सम्प्रदं सज्जनानन्ददं, सैल-कन्या-वरं परम रम्यं। काम-मद-मोचनं तामरस-लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं ॥१॥ कम्बु-कुन्देन्दु-कर्पूर-गौरं शिवं, सुन्दरं सच्चिदानन्द कन्दं। सिद्ध-सनकादि योगीन्द्र-वृन्दारका, विष्णु-विधि-वन्द्य चरनारविन्दं ॥२ ब्रह्म कुल वल्लभं, सुलभमति दुर्लभं, विकट वेषं विभुं, वेदपारं। नौमि करुनाकरं गरल गंगाधरं, निर्मलं निर्गुनं निर्विकारं ॥३॥ लोकनाथं सोकसूल निर्मूलिनं, सूलिनं मोह-तम-भूरि-भानुं। कालकालं, कलातीतमजरं हरं, कठिन कलिकाल कानन कृसानुं ॥४॥ तज्ञमज्ञान-पाथोधि-घटसम्भवं, सर्वगं सर्वसौभाग्यमूलं। प्रचुर भव-भंजनं, प्रनत जनरंजनं, दासतुलसी सरन सानुकूलं ॥५॥ शब्दार्थ—तामरस = कमल। कन्द = मेघ। वृन्दारका = देवता। विभु = व्यापक। निर्विकार = विकाररहित। भानु = सूर्य। कृसानु = अग्नि। तज्ञ = तत्त्ववेत्ता। पाथोधि = समुद्र। घट-सम्भव = घड़ेसे उत्पन्न, अगस्त्य ऋषि।