विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in contextविनय-पत्रिका ३५ ५—'गव्य'—पंचगव्यमें गायका दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र—ये पाँच वस्तुएँ हैं। ६—इस पदमें रूपकालंकारका लक्षण यह है:— उपमेयरु उपमान को इक करि कहत जु रूप । सो रूपक द्वै भाँति को, मिलि अभेद तद्रूप ॥ (पद्माभरण) अर्थात् उपमेय और उपमानको एक करके कहनेको रूपक (रूपं स्वभावे; मनोहर कृतौ) कहते हैं। इसके अभेद और तद्रूप दो भेद हैं। इनमें प्रत्येकके तीन-तीन (१ अधिक, २ न्यून, ३ सम) उपभेद हैं। अभेदके उदाहरण अभेद अधिक—नव बिधु विमल तात जस तोरा । रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥ (रा० च० मा०) अभेद न्यून—अति खल जे विषयी बक कागा। अभेद सम—तुव मुख पंकज विमल यह, धरत सुवास भछेह । तद्रूपके उदाहरण तद्रूप अभेद—विष वारुनी बंधुप्रिय तेही । कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥ तद्रूप न्यून—राममात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बढ़ नाम तुम्हारा ॥ तद्रूप सम—लषन उतरु आहुति सरिस, भृगुपति कोप कृसानु । सूचना—जहाँ उपमेयको उपमान मानकर उपमानसे ही उसकी तुलना की जाती है, उसे तद्रूप रूपक और जहाँ उपमेयको उपमान मानकर उसकी तुलना उपमानसे नहीं की जाती, उसे अभेद रूपक अलङ्कार कहते हैं । चित्रकूट-स्तुति राग बसन्त ( २३ ) सब सोच-विमोचन चित्रकूट। कलिहरन, करन कल्यान कूट ॥१॥ सुचि अवनि सुहावनि आलबाल। कानन विचित्र, बारी बिसाल ॥२॥