विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context३६ विनय-पत्रिका मंदाकिनि-मालिनि सदा सींच। बर बारि, विषम नर नारि नीच ॥३॥ साखा सुस्रृंग, भूरूह-सुपात। निरझर मधुवर, मृदु, मलय बात ॥४॥ सुक पिक, मधुकर मुनिवर-विहारु। साधन प्रसून, फल चारि चारु ॥५॥ भव-घोर घाम-हर सुखद छाँह। थप्यो थिर प्रभाव जानकी-नाहु ॥६॥ साधक-सुपथिक बड़े भाग पाइ। पावत अनेक अभिमत अघाइ ॥७॥ रस एक, रहित-गुन-करम-काल। सिय राम लखन पालक कृपाल ॥८॥ तुलसी जो रामपद चहिय प्रेम। सेइय गिरि करि निरुपाधि नेम ॥९॥ शब्दार्थ-बूट = हरा वृक्ष। बारी = बगीचा। भूरुह = पेड़। मलय = चन्दन। बात = हवा। नाहु = स्वामी। अघाइ = तृप्त होना या पूर्ण होना। भावार्थ—सब शोकोंसे छुड़ानेवाला चित्रकूट (पर्वत) कलिका नाश करने- वाला और कल्याण करनेवाला हरा वृक्ष है ॥१॥ वहाँकी पवित्र भूमि उस वृक्षके लिए सुहावना थाल्हा है। बगीचोंमें अपूर्व वृक्ष हुआ करते हैं। चित्रकूटके चारों ओर जो विचित्र वन है, वही बड़ा बगीचा है ॥२॥ जिस प्रकार मालिन जल-सिंचनके समय किसी खास वृक्षके प्रति पक्षपात नहीं करती और न तो किसीकी उपेक्षा, उसी प्रकार मन्दाकिनी नदी रूपी मालिन अपने श्रेष्ठ जलसे, वहाँ निवास करनेवाले सभी अच्छे-बुरे (ऊँच-नीच) नर-नारियोंका हमेशा समान भावसे पोषण करती है ॥३॥ चित्रकूट पर्वतके सुन्दर शिखर ही उस वृक्षकी शाखाएँ हैं और उसके ऊपरके वृक्ष ही उत्तम पत्ते हैं। झरनोंसे झरनेवाला श्रेष्ठ और मीठा जल ही मृदु मलय वायु है, और हवा ही उसकी कोमलता है ॥४॥ वहाँ बिहार करनेवाले मुनीश्वर ही तोता, कोयल और भौंरे हैं। उन मुनीश्वरोंकी नाना प्रकारकी साधनाएँ ही उस वृक्षके पुष्प हैं और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष— ये ही चार सुन्दर फल हैं ॥५॥ उस वृक्षकी सुखदायिनी छाया संसारकी जन्ममृत्यु- रूपी कड़ी धूपको हरनेवाली है। जानकी-वल्लभ श्रीरामने वहाँ निवास करके उसके प्रभावको और भी स्थायी कर दिया है ॥६॥ साधकरूपी उत्तम बटोही बड़े भाग्यसे उसे प्राप्त करते हैं और पाते ही उनकी नाना प्रकारकी आकांक्षाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥७॥ वह गुण, कर्म और कालसे रहित एवं एकरस रहनेवाला है। कृपालु सीता, राम और लक्ष्मण उनके रक्षक हैं। तुलसीदास कहते हैं कि