यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय घृतपान आप को इष्ट है. आप ज्योतिवर्धक हैं. आप ब्रह्मज्ञानी को हम घी की आहुति भेंट करते हैं. ( ४७ ) अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः. वसुरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दाः. तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः.. (४८) हे अग्नि! आप अन्यतम, ज्ञाता, शिव हमारे संरक्षक हैं. आप धनवान व प्रख्यात हैं. आप अग्रगामी, श्रेष्ठलोक वासी, धनदाता, ज्योतिमान व स्वर्गलोक के प्रकाशक हैं. हम अच्छे मन वाले और अपने सखाओं के कल्याण के लिए आप से निवेदन करते हैं. ( ४८ ) येन ऋषयस्तपसा सत्रमायन्निन्धाना ऽ अग्नि १७ स्वराभरन्तः. तस्मिन्नहं नि दधे नाके अग्निं यमाहुर्मनवस्तीर्णबर्हिषम्.. (४९) ऋषियों ने तपस्या से अग्नि को प्रज्वलित किया. अपने स्वर से ऋषियों ने अग्नि को प्रज्वलित किया. हम स्वर्गलोक में अग्नि को धारते हैं. हम अग्नि से विस्तृत कुश के आसन पर विराजने का अनुरोध करते हैं. ( ४९ ) तं पत्नीभिरनु गच्छेम देवाः पुत्रैर्भ्रातृभिरुत वा हिरण्यैः. नाकं गृभ्णानाः सुकृतस्य लोके तृतीये पृष्ठे अधि रोचने दिवः.. (५०) हे अग्नि! आप दिव्य गुणों से संपन्न हैं. हम पत्नी, पुत्र, भाई आदि सहित आप का संरक्षण पाएं. हम इन सब के साथ आप का अनुकरण करें. हम स्वर्ग पाने के लिए आप का अनुकरण करें. आप श्रेष्ठकर्मा हैं. आप स्वर्गलोक में प्रकाशित होते हैं. हम आप की कृपा से श्रेष्ठ लोक को प्राप्त करें. ( ५० ) आ वाचो मध्यमरुहद्दुरण्युर्यमग्निः सत्पतिश्चेकितानः. पृष्ठे पृथिव्या निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः.. (५१) हे अग्नि! आप संसार का भरणपोषण करते हैं. आप सत्पति व चैतन्य हैं और पृथ्वि के पृष्ठ भाग पर स्थित हैं. आप स्वर्गलोक को भी द्युतिमान बनाते हैं. हम पवित्र मंत्रों से आप की स्थापना करते हैं. जो शक्तिशाली हमें नष्ट करना चाहते हैं, आप उन्हें नष्ट करने की कृपा करें. ( ५१ ) अयमग्निtoken -> अयमग्निर्विरतमो वयोधाः सहस्रियो द्योततामप्रयुच्छन्. विभ्राजमानः सरिरस्य मध्य ऽ उप प्र याहि दिव्यानि धाम.. (५२) यह अग्नि वीरतम और वय ( आयु ) धारक हैं. वे हजारों कार्यों के साधक हैं. वे आलस्य रहित हो कर यजमान का कार्य संपादित करते हैं. वे तीनों लोकों के बीच के दिव्य धाम में हमें पहुंचाने की कृपा करें. ( ५२ ) यजुर्वेद - १९१