यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सामने खड़े हैं। जब अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र से उत्पन्न मोह इत्यादि स्वजन-समुदाय मिट ही जायेंगे, तब हम जी कर ही क्या करेंगे? अर्जुन पुनः सोचता है कि जो कुछ हमने कहा, कदाचित् यह भी अज्ञान हो; अतः प्रार्थना करता है- कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७॥ कायरता के दोष से नष्ट स्वभाववाला, धर्म के विषय में सर्वथा मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ। जो कुछ निश्चित परम कल्याणकारी हो, वह साधन मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझे साधिये। केवल शिक्षा न दीजिये, बल्कि जहाँ लड़खड़ाऊँ वहाँ सँभालिये। 'लाद दे लदाय दे और लदानेवाला साथ चले- कदाचित् गट्ठर गिर पड़ा, तब कौन लदवायेगा?'-ऐसा ही समर्पण अर्जुन का है। यहाँ अर्जुन ने पूर्ण समर्पण कर दिया। अभी तक वह श्रीकृष्ण को अपने स्तर का ही समझता था, अनेक विद्याओं में अपने को कुछ आगे ही मानता था। यहाँ उसने अपनी बागडोर श्रीकृष्ण को वस्तुतः सौंप दी। सद्गुरु पूर्तिपर्यन्त हृदय में रहकर साधक के साथ चलते हैं। यदि वे साथ न रहें तो साधक पार न हो। युवा कन्या के परिवारवाले जिस प्रकार शादी-विवाह तक उसको संयम की शिक्षा देते हुए सँभाल ले जाते हैं, ठीक इसी प्रकार सद्गुरु अपने शिष्य की अन्तरात्मा से रथी होकर उसे प्रकृति की घाटियों से निकालकर पार कर देते हैं। अर्जुन निवेदन करता है कि- भगवन्! एक बात और है- न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८॥ भूमि पर निष्कण्टक धन-धान्यसम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपन इन्द्रपद को पाकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो मेरी इन्द्रियों