भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१३२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ¹अहौ एव द्वे अप्यक्षरे अकुलकुलकुण्डलिनीरूपे पराया रूपे, तदवयवत्वात्, तयोः परारूपयोः प्रतिबिम्बरूपे ²अहंकाराक्षरैऽकारहकारयोः स्फुरितत्वात् ॥२१॥ मन्त्रनिदान³भूतकामकलायामकारहकारयोः स्थितिं व्युत्पाद्येदानीं मन्त्रे तद्वर्णद्वयस्य स्थितिमाह— मध्यप्राणप्रथारूपस्पन्दव्योम्नि स्थिता पुनः । मध्यमे मन्त्रपिण्डे तु तृतीये पिण्डके पुनः ॥२२॥ राहुकूटॉद्वयस्फूर्जत् मध्यमे मन्त्रपिण्डे वाग्भवशक्तिबीजयोर्मध्यगते कामराजबीजाख्ये षडक्षर- पिण्डे । मध्यप्राणप्रथारूपस्पन्दव्योम्नि स्थिता पुनः⁴ । मध्यप्राणः कामकलाधो- गतबिन्दुद्वयमध्यगतप्राणो हकारः, तस्य प्रथा पृथुत्वेन प्रतीतिः, श्रुतिगोचरत्वात्, तद्रूपं स्पन्दव्योम हकारः, तस्मिन् व्योम्नि पुनः स्थिता, हकारस्य विमर्शशक्ति- स्फूर्तिमयत्वात् । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः" इति । वाणी की ही अंगभूत हैं और इन परा-स्वरूपा कुण्डलिनियों के प्रतिबिम्ब स्वरूप एक समरस अहंकाराक्षर से ही अकार और हकार वर्णों की उत्पत्ति होती है ॥ २१ ॥ सभी मन्त्रों की उत्पत्ति में कारणभूत कामकला में अकार और हकार की स्थिति को स्पष्ट करने के बाद मन्त्र में उन दोनों वर्णों की स्थिति स्पष्ट की जाती है— मध्यम मन्त्रपिण्ड(कामराज बीज) में मध्यप्राण की प्रथा के रूप में विद्यमान स्पन्द रूपी व्योम (हकार) में यह स्थित है। तृतीय पिण्ड (शक्ति बीज) में तो यह राहुकूट में तृतीय स्थान पर विद्यमान सकार के अकार के रूप में स्थित है ॥२२-२३॥ मध्यम मन्त्रपिण्ड में, वाग्भव और शक्तिबीज के मध्यवर्ती कामराज बीज नामक छः अक्षरों वाले पिण्ड मन्त्र में, मध्यप्राण, अर्थात् कामकलाक्षर के अधोगत दो बिन्दुओं के मध्य में स्थित प्राण (हकार) की जो स्थूल रूप में श्रवणेन्द्रिय द्वारा प्रतीति होती है, उसी को स्पन्द व्योम (हकार) कहा जाता है । इसी स्थूल स्पन्दनात्मक हकार में वह विद्या स्थित है, अर्थात् इस प्रकार उक्त मन्त्रराज में कामकलागत हकार वर्ण स्थित है, क्योंकि हकार का स्वरूप विमर्श शक्ति से ही स्फुरित होता है । संकेतपद्धति में यह बताया गया है—"कलारूप अन्तिम वर्ण हकार विमर्शा नाम से जाना जाता है" । १. सतो द्वे द्वे आद्याक्षरे-झ. उ. । २. बिन्द्वाकारा-ग. ने. झ. उ. । ३. निगम- ४. 'पुनः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ।